कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context३३४ ] [ कल्कि पुराण
दक्षिण भाग में श्रेष्ठ आश्रम बनाकर मैं अपनी पत्नी और अनुगामियो के
सहित हरि-सेवा मे तत्पर हो गया ।३०।
मायासंदर्शनाकाङ्क्षी हरिसद्मनि संस्थितः ।
गायन्नृत्यञ्जपन्नाम चिन्तयञ्छमनापहम् ।।३१।
एवं वृत्ते द्वादशाब्दे द्वादश्या पारणादिने ।
स्नातुकाम समुद्रेऽह बन्धुभि, सहितो गत ।३२।
तत्र मग्न जलनिधौ लहरीलोलसङ्कुले ।
समुत्थातुमशक्त मा प्रतुदन्ति जलेचराः ।३३।
निमज्जनो मज्जनेन व्याकुलो कृतचेतसम् ।
जलहिल्लोलमिलनदलिताङ्गमचेतनम् ।३४।
जलधेदक्षिणे कूले पतित पवनेरितम् ।
मा तत्र पतित दृष्ट्वा वृद्धशर्मा द्विजोत्तम ।।३५।।
सन्ध्यामुपास्य सघृण स्वपुर मा समानयत् ।
स वृद्धशर्मा धर्मात्मा पुत्रदारधनान्वितः ।
कृतवारुग्णान्तु मा तत्र पुत्रवत्पर्यपालयत् ।३६।
भगवान् के उस धाम मे रहता हुआ प्रभु माया का दर्शन करने
की कामना से मैं नृत्य, गायन तथा जप पूर्वक यम का भय दूर करने
वाले भगवान् विष्णु का ध्यान करने लगा ।।३१।। इस प्रकार बारह वर्ष
व्यतीत होगए । एक दिन द्वादशी का पारण था, तब मैं स्नान करने के
विचार से अपने बन्धुओ सहित समुद्र के तट पर पहुँचा ।।३२।। जैसे ही
गोता लगाया, वैसे ही मैं समुद्र की भयंकर तरंगराशि से व्याकुल हो
गया। मुझमे उठने की शक्ति नही रही । तभी जलचर जीव मुझे व्यथित
करने लगे ।३३। मैं कभी उछलता था, कभी डूबता, इससेमेरा चित्त बडा
व्याकुल हुआ । जल की तरगो के थपेडो से शिथिल अ ग हुआ मैं अचेत
हो गया ।।३४।। फिर मैं वायु की हिलोर से बहता हुआ समुद्र के दक्षिण
किनारे पर लग गया । मुझे अचेतावस्था में पड़ा देख कर वृद्ध शर्मा