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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

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DevanagariHindipublished259 pages

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द्वितीय अध्याय-२ [ ३२५
अपनी प्रिय पत्नी को प्राप्त कर साधुजनो से सत्कृत हुए कल्किजी
सिंहल द्वीप को श्रेष्ठ स्थान देख कर कुछ दिनो तक वहाँ रहे ।१६। जो
राजा स्त्रीत्व को प्राप्त होकर पद्मा की सखी बन गये थे, वे सभी भगवान्
कल्कि के दर्शनार्थ वहाँ उपस्थित हुए ।१७। वे सभी स्त्रीत्व को प्राप्त हुए
राजागण भगवान् के दर्शन प्राप्त कर उनके चरण स्पर्श करते हुए उनकी
आज्ञा से रेवा नदी पर पहुँचे और स्नान करते ही पुरुषत्व को प्राप्त हो
गये।१८। पद्मा और कल्कि गौर तथा कृष्ण वर्ण वाले हैं । दोनो विपरीत
वर्णों के सम्मिलन से पद्मा के नीलाम्बर और कल्कि के पीताम्बर द्वारा
एक बाह्य वर्ण प्रकाशित हुआ और परस्पर समन्वित दिखाई देने लगा
।१६। कल्किजी का अत्यन्त अद्भुत पराक्रम देख कर सभी राजागण
उनकी शरण को प्राप्त होकर भक्तिपूर्वक प्रणाम और स्तुति करने
लगे ।२०।
जय जय निजमायया कल्पिताशेषकल्पनापरिणाम ।
जलाप्लुतलोकत्रयोपकरणमाकलय्य मनुमनिशम्य पूरितावि-
जनाविजनाविर्भूत महामीनशरीर ! त्वं निजकृतधर्म्मसेतुसर-
क्षणकृतावतारः ।२१।
पुनरिहदितिज-बल-परिलाङ्घत-वासव-सूदनादृत-जितत्रिभुवन
पराक्रम-हिरण्याक्षनिधन पृथिव्युद्धरणसकल्प-भिनिवेशेन धृत-
कोलावतारः पाहि नः ।२२।
पुनरिह जलधि मथनादृत-देवदानवगण मन्दराचलानयनव्या-
कुलिताना साहाय्येनादृतचित्त. पर्व्वतोद्धरणामृतप्रासनरचना
वतारः कूम्माकारः प्रसीद परेश । त्वं दाननृपाणाम् ।२३।
हे प्रभो ! आपकी जय हो । आपकी ही कल्पना-शक्ति से संसार
विविध प्रकार से कल्पित हुआ है । जब तीनो लोग प्रलय मे लीन हो गये,
तब आपने जनशून्य स्थल मे प्रकट हुए थे । आपने ही धर्म-सेतु के सर-
क्षण हेतु महामीन (मत्स्य) देह धारण किया था ।२१। जब दनुज-सैन्य