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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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Page 71

३२४ ] [ कल्कि पुराण
यथा मान्धातृपुत्रस्य यदुनाथेन कानने ।१३।
इत्युक्त्वा तं पूजयित्वा समानीय निजाश्रमे ।
हर्म्यप्रासादसबाधे स्थापयित्वा ददौ सुताम् ।१४।
पद्मा पद्म पलाशक्षी पद्मनेत्राय पद्मनीम् ।
पद्मजादेशतः पद्मनाभायादायथाक्रमम् ।१५।
उन रूप-लावण्य के घर, कामदेव के उद्यम को नष्ट करने वाले,
देह के अग्रभाग मे पीताम्बर धारण किये हुए तथा रूप, शील और गुण
की खान लक्ष्मीपति कल्किजी को देख कर अश्रुयुक्त पुलकित देह के
सहित राजा ने उनका विधि पूर्वक पूजन किया ।११-१२। राजा बोला—
हे ईश्वर ! जैसे यदुनाथ वन मे जाकर मान्धाता के पुत्र से मिले थे, वैसे
ही आप ज्ञानगोचरातीत का आगमन मेरे लिए हुआ है ।१३। यह कह
कर कल्किजी का पूजन करके राजा उन्हे अपने भवन में ले आये और
सुसज्जित गृह मे टिका कर उन्हे अपनी कन्या का दान कर दिया ।१४।
पद्मोत्पन्न ब्रह्माजी के आदेशानुसर पद्मनाभ एव पद्मलोचन भगवान्
कल्कि को पद्म-पत्र जैसे नेत्र वाली पद्मिनी संज्ञक पद्मा का यथाविधि
दान किया ।१५ ।
कल्किर्लब्धवा प्रिया भार्यां सिंहले साधुसत्कृत. ।
समुवास विशेषज्ञ समीक्ष्य द्वीपमुत्तमम् ।१६।
राजान. स्त्रीत्वमापन्नाः पद्मायाः सखिता गताः ।
द्रष्टु समीयुस्त्वरिता, कल्कि विष्णु जगत्पतिम् १७।
ता; स्त्रियोऽपि तमालोक्य सस्पृश्यचरणाम्बुजम् ।
पुनः पु स्त्व समापन्ना रेवासनानात्तदाज्ञया ।१८।
पद्माकल्की गौरकृष्णौ विपरीतान्तरावुभौ ।
बहि.स्फुटौ नीलपीत-वासोव्याजेन पश्यतु ।१९।
दृष्ट्वा प्रभाव कल्केस्तु राजानः परमाद्भुतम् ।
प्रणम्य परया भक्त्या तुष्टुवुः शरणार्थिनः ।२०।