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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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द्वितीयांश—
तृतीय अध्याय
मा पद्मात हीर मत्वा प्रेमगद्गदभाषिणी ।
तुष्टाव व्रीडिता देवी करुणावरुणालयम् ॥१॥
प्रसीद जगता नाथ ! धर्मंन् ! रमापते ! ।
विदितोऽसि विशुद्धात्मन् ! वशगा त्राहि मा प्रभो ! ॥२।
धन्याह कृतपुण्याह तपोदानजपव्रतैः ।
त्वा प्रतोष्य दुराराध्यं लब्ध तव पदाम्बुजम् ॥३॥
आज्ञा कुरु पदाम्भोज तव सस्पृश्य शोभनम् ।
भवनं यामि राजानमाख्यातु स्वागत तव ।४।
इति पद्मा रूपसद्मा गत्वा स्वपितर नृपम् ।
वाचागमनम कल्केर्विष्णोरशस्य दौत्यकैः ॥५॥
सूतजी बोले—प्रेम से गद्गद् होकर भाषण करने वाली पद्मा
ने कल्किजी को भगवान् विष्णु के रूप मे जान कर उनकी स्तुति
की ।१। हे जगदीश्वर ! हे धर्मवर्मन् ! हे लक्ष्मीपते ! मैं आपको जान गई
हूँ । अब आप मुझ शरणागता की रक्षा कीजिए ।२। मैं धन्य हो गई
प्रभो ! जो अपने पुण्यकर्मों अर्थात् तप, दान, जप और व्रतादि के
सहित आपकी आराधना करके आपके दुष्प्राप्य चरण कमलो को प्राप्त
कर सकी ।३। अब आप मुझे आज्ञा दे कि मैं आपके पदाम्बुजो का स्पर्श
करके अपने घर जाऊँ और महाराज से आपके आगमन की बात सूचित
करूँ ॥४॥ यह कह कर श्रेष्ठ रूप वाली पद्मा ने अपने पिता राजा
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