कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextद्वितीय अध्याय- १ [ ३२१
लोलाक्षि ! लावण्य-रसामृत ते कामहिदष्टस्य विधातुरस्य ।
तनोतु शान्तिसुकृतेन कृत्या सुदुर्लभां जीवनमाश्रितस्य २७॥
बाहूतवैतौ कुरुता मनोज्ञौ हृदि स्थितं काममुदन्तवासम् ।
चार्वार्यतौ चारुनरवांङ्कुशेन द्विप यथा सादिविदीर्णकुम्भम् २८
पादाम्बुज तेऽङ्गुलिपत्रचित्रित वर मरालक्वराणनूपुरा-
वृतम् । कायाहिदष्टस्य ममास्तु शान्तये हृदि स्थितं प-
द्मघनेसुशोभने ॥२६॥
श्रुत्वैतद्वचनामृत कलिकुलध्वसस्य कल्केरलं
दृष्ट्वा सत्पुरुषत्वमस्य मुदिता पद्मा सखीभिर्वृता ।
कान्ता क्लान्तमनाः कृताञ्जलिपुटा प्रोवाचतत्सदरं
धीर धीरपुरस्कृतं निजपतिं नत्वा नमतकन्धरा ।३०।
हे कान्ते ! तुम मेरे पास आओ, तुम्हारे मिलने से मेरा मंगल
हुआ है । तुम्हारे चन्द्रमुख की देखकर मेरा सताप मिट गया ।२६। हे
चवलाक्षि ! मुझ संसार के रचने वाले को इस समय वासना रूपी सर्प
ने दंशित किया है । तुम्हारे लावण्य-रस रूपी अमृत के पान से उसकी
शान्ति संभव है । यह शान्ति सुकृत्यो से भी दुर्लभ और जीवन के लिए
आश्रय स्वरूप होगी ।२७। जैसे महावत अपने अंकुश से गजराज का
कुम्भ भेदन करता है, ठीक वैसे ही तुम्हारी यह सुरम्य भुजाएँ नख रूप
अंकुश के द्वारा मेरे हृदयस्थ कामरूप हाथी के कुम्भ का भेदन करें ।२८।
मेरे हृदयोदधि के स्वच्छ नीर मे स्थित अंगुलि रूपी कमल-पत्र द्वारा
चित्रित हंस जैसा शब्द करने वाले एव नूपुरो से सुशोभित मंजु घोष
करने वाले पादाम्बुज के द्वारा काम-जनित विष का शमन हो ।२६।
कलिकुल विध्वंसक कल्किजी के वचनामृत सुनकर और उन्हे सत्पुरुषत्व
से युक्त जान कर पद्मा अत्यन्त हर्षित हुई । फिर वह क्लान्त मन हुई
पद्मा सखियो सहित मस्तक झुकाकर अपने पति कल्कि भगवान् से मद
स्वर में कहने लगी ।३०।