कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextप्रथम अध्याय २ ] [ ३१५
वन ददर्श रुचिर फलपुष्पलावृतम् ॥ ४६ ॥
दृष्ट्वा हृष्टतनू शुक सकरुण. कल्कि पुरान्ते वने
प्राह प्रीतिकर वचोऽत्र सरसि स्नातव्यमित्यादृत. ।
तच्छ्रुत्वा विनयान्वित. प्रभुमताया मोति पद्माश्रम
तत्सन्देशमिह प्रयाणमधुना गत्वा स कोरोऽवदत् ॥ ४७ ॥
वन कदम्ब, कुद्दाल, शाल, ताल, आम, केसर, कैथ, अश्वत्थ,
खजूर, बीजपूर, करज, पुन्नाग, पनस, नारंगी, अर्जुन, शिशपा, क्रमुक,
नारियल आदि विविध प्रकार के वृक्षो से सुशोभित और फल, पुष्प,
पत्रादि से परिपूर्ण उस स्थान को कल्किजी ने देखा ।४५-४६। यह सब
देखते हुए पुरी के समीपस्थ वन मे पहुच कर पुलकित देह हुए कल्किजी
ने आदर सहित शुक से कहा—'इस सरोवर में स्नान करने की इच्छा
है' । यह सुनकर शुक ने विनय पूर्वक कहा—अच्छा, अब मैं भी पद्मा के
निवास स्थान पर जाता हूँ । यह कह कर शुक पद्मा के पास गया और
उससे कल्कि भगवान् के आगमन का प्रसग कह दिया ।४७।
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