कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context३१४ ] [ वह्नि पुराण
सुनाया ।३७। फिर पद्मा के साथ जो सवाद हुआ वह तथा स्वर्ण-
मणियों की उपलब्धि आदि सब वृत्तान्त विनम्र होकर शुक ने उन्हें
सुना दिया ।३८। वल्किजी ने जैसे ही यह वृत्तान्त सुना, वैसे ही प्रसन्न
होते हुए वे शिवदत्त अश्व पर चढ कर शुक के साथ चल दिये ।३६।
समुद्रपारममल सिंहल जलसकुलम् ।
नानाविमानबहुल भास्वर मणिकाञ्चनै ॥ ४० ॥
प्रासादसदनाग्रेषु पताकातोरणाकुलम् ।
श्रेणीसभापणाट्टाल-पुरगोपुरमण्डितम् ॥ ४१ ॥
पुरस्त्री-पद्मिनी-पद्मगन्धामोद-द्विरेफिणीम् ।
पुरी कारुमती तत्र ददर्श पुरतः स्थिताम् ॥ ४२ ॥
मराल-जाल-सञ्चाल-विलोला-कमलान्तराम् ।
उन्मीलताब्जमालालिकलिताकुलित सर ॥ ४३ ॥
जलकुक्कुटदात्यूह-नादित हससारसैः ।
ददर्श स्वच्छपयसा लहरीलोलवीजितम् ।, ४४ ।।
चलते-चलते समुद्र पार पहुंच कर उन्होने स्वच्छ जल से घिरे
हुए, विभिन्न विमानो सेयुक्त, मणियो और स्वर्ण से दमकते हुए,
अट्टालिकाओ और भवनो के समक्ष पताकाओ और तोरणो से सजे हुए
सभामडप वाले, दुकानो और गोपुरादि से समन्वित, पद्मिनी नारियो के
पद्मगध से हर्षित मँडराते हुए भ्रमर समूह से युक्त कारूमती सिंहल पुरी
को देखा ।४०-४२। जहाँ जलाशयो मे हस-समूह कलोल कर रहे हैं,
कमलो पर भ्रमर गुंजार रहे हैं, जलकुक्कुट, दात्यूह, हस, सारस आदि
कलरव कर रहे हैं तथा जल की लोल लहरी के साथ इठलाती वायु
प्रवाहित है ।४३-४४।
वन कदम्बकुद्दाल-शालतालाम्रकेसरै ।
कपित्थाइश्वत्थखजूरबीजपूरकरंजकै ॥४५ ॥
पुंनागपूतसैर्मार्गरङ्गे ार्जुनशिंशपै ।
क्रमुकैनारिकेलैश्च नानावृक्षैश्च शोभितम् ।