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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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Page 51

३०४ ] [ कल्कि पुराण
शातोदरं भगवतस्त्रिवलिप्रकाशभावर्त्तनाभि-
विकनद्विधिजन्मपद्मम् । नाडीनदीगणरसोत्थ-
सितन्त्रसिन्धु ध्यायेऽण्डकोषनिलय तनुरोमरेखम् । १६
वक्षः पयोधितनयाकुङ्कुमेन धारेण कौस्तु-
भमणिप्रभयां विभातम् । श्रीवत्सलक्ष्म हरि च-
न्दनप्रसूममालोचित भगवतः सुभग स्मरामि । १७
जो उदर त्रिवाली से सुशोभित हैं, जिस उदर के नाभि कमल
से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए हैं, जिस उदर मे नाडी रूपी सरिताओ के रथ से
अन्त्र रूप समुद्र तरगित हो रहा है, ब्रह्माण्ड के आश्रय रूप जिस उदर
मे लोभ रेखाएं सुशोभित है, भगवान् के उस उदर का मैं स्मरण करता
हूँ ।१६। जिस हृदय मे समुद्रजा लक्ष्मी के वक्षस्थल की केसर लगी हुई
है, जो हृदय कठहार ओर कौस्तुभ मणि से दमक रहा है, जो हृदय
श्रीवत्स के चिह्न से युक्त है और जिस पर हरिचन्दन फूलो की माला
विभूषित है उस प्रभु-हृदय का मैं स्मरण करता हूँ ।१७।
बाहू सुवेशसदनौ वलयाङ्गदादिशोभास्पदौ दुग्ति
दैत्यविनाशदक्षौ । तौ दक्षिणौ भगवतश्च गदासु-
नाभतेजोजितौ सुललितौ मनसा स्मरामि । १८
वामौ भुजौ मुररिपोर्धृतपद्मशंखौ श्यामौ करीन्द्रकर
वन्मणिभूषणाढ्यौ । रक्ताङ्गुलिप्चयचुम्बितजानु
मध्यौ पद्नालयाप्यिकरौ रुचिरौ स्मरामि । १६
कण्ठ मृणालममलं मुखपङ्कजस्य लेखाययेणावन
मालिकया निवत्तम् । किंवा मुक्तिरसमन्त्रकस
त्फलस्य वृन्ते चिरं भगवत सुभग स्मरामि । २०
जिन श्रेष्ठ भुजाओ मे वलय अ गद आदि सुन्दर आभूषण सुशो-
भित है, जो भुजाएँ असख्य दानवो का संहार कर चुकी है, जिन भुजाओ
की प्रभा के समक्ष गदा और चक्र आदि अस्त्रो का तेज भी नगण्य है, मैं