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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

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DevanagariHindipublished259 pages

Page 50 of 259

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Page 50

सप्तम अध्याय ] [ ३०३
भभाने लोकेक्षणोत्सवकरे च हरे स्मरामि। १३
ते जानुनी मखपतेर्भजमूलसङ्गरङ्गोत्सवावृतत-
डिद्वसने विचित्रे। चञ्चत्पतत्रमुखनिर्गतसामगीन
विस्तारितात्मयशसी च हरे स्मरामि॥ १४
विष्णो कटिं विधिकृतान्तमनोजभूमि जीवाण्ड-
कोषणरासङ्गदुकूलमध्याम्। मानागुणप्रकृतिपी-
तविचित्रवस्त्राध्यायेन्निबद्धवसना खगपृष्ठसंस्थाम्। १५
ध्यान के पश्चात् "ॐ नमो नारायणाय स्वाहा" कहे और इस
स्तोत्र का उच्चारण करे-योग के द्वारा सिद्ध हुए ज्ञानीजन जिनके
ध्यान में सदा रत रहते हैं, जो लक्ष्मी के आश्रय हैं, जिनके भक्तगण
भृङ्ग रूपी तुलसी का सदा सेवन करते हैं, जिनके लोहित वर्ण कमलो-
पम नखयुक्त अँगुलिपद्मों से गङ्गाजल निकल रहा है, उन कमल जैसे
चरणों वाले नारायण की शरण लेता हूँ ॥ १॥ जिनके चरणों में विभू-
षित मणिमान् युक्त नूपुर हंस के कलरव जैसा शब्द करते हैं, जिन चरणों
में पीताम्बर का छोर उड़ती हुई ध्वजा जैसा लगता है, जिन चरणों में
स्वर्णिम त्रिवक्र नामक कड़ा शोभित है, उन कमल के समान चरणाम्बुजों
का मैं स्मरण करता हूँ ॥२॥ गरुड के कण्ठ भूषण रूप नीलकान्त
मणि की प्रभा से समुज्ज्वल जिन जंघाओं के मध्य में गरुड की अरुण-
मणि के समान लाल चोंच सुशोभित है, जिन जंघाओं के नीचे लाल
पादतल स्थिर हैं, उन विश्व-लोचन के परमानन्द रूप भगवान् की
जंघाओं का मैं स्मरण करता हूँ ॥३॥ सामगान के द्वारा गरुड जिनका
यशोगान करते हैं, उत्सव के अवसर पर चित्र विचित्र रंगों से युक्त वस्त्रों
की विद्युत् आभा से विभूषित भगवान् की उन जंघाओं का स्मरण
करता हूँ ॥४॥ ब्रह्मा, काल और कन्दर्प की आश्रयभूता जो कटि है तथा
जो कटि दुकूल से सुशोभित रहती है, गरुड की पीठ पर स्थित विष्णु
की उस कटि का मैं ध्यान करता हूँ ॥५॥