Skip to content
SarvaKosh
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished259 pages

Page 245 of 259

Read in context
Page 245

४६८ ] [ कल्कि-पुराण
पूर्णज्योतिर्मय साक्षी परमात्मा पुरातनः ।
बभौ सूर्यसहस्राणां तेजोराशिसमद्युतिः ।२२।
शंखचक्रगदापद्मशाङ्गद्यैः समभिष्टुतः ।
नानालङ्करणानाञ्च समलङ्करणाकृतिः ।२३
ववृषुस्तं सुराः पुष्पैः कौस्तुभामुक्तकन्धरम् ।
सुगन्धि कुसुमासारैर्देवदुन्दुभिनिःस्वने ।२४।
तुष्टुवुर्मुमुहुः सर्वे लोका संस्थाणुजंगमाः ।
दृष्ट्वा रूपमरूपस्य निर्याणे वैष्णवं पदम् ।२५।
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं पत्युः कल्केर्महात्मनः ।
रमा पद्मा च दहनं प्रविश्य तमवापतुः ।२६।
तब वे पूर्ण ज्योतिमान् सर्वसाक्षी स्वरूप, सनातन पुरुष परमात्मा
कल्किजी सहस्रो सूर्य के समान तेज से प्रकाशित हो रहे थे ।२२। विविध
अलकारो से युक्त वे स्वयं भी अलकार के समान प्रकाशित हो रहे थे ।
शंख, चक्र, गदा, पद्म और शाङ्ग धनुष आदि समन्वित उनका वर्ण
विग्रह पूजित होने लगा ।२३। उनके वक्षस्थल पर कौस्तुभमणि - सुशोभित
थी । देवगण उन पर पुष्पवृष्टि कर रहे थे और सब ओर दुन्दुभिया बज
रही थी ।२४। जब वे कल्किजी विष्णुपद में प्रविष्ट हुए, तब उन अरूप
जगदीश्वर के रूप-दर्शन से सभी जीव मोह को प्राप्त हो गए ।२५। अपने
पति कल्किजी के इस अद्भुत रूप को देख कर रमा और पद्मा अग्नि
मे प्रविष्ट होकर उसमें लीन होगई ।२६।
धर्म कृतयुगं कल्केराज्ञया पृथिवीतले ।
निःसपत्नौ सुसुखिनौ भूलोकं चेरतुश्चिरम् २७।
देवापिश्च मरुः कामं कल्केरादेशकारिणौ ।
प्रजाः सपाल्तौ तु भुवं जुगुपतुः प्रभू ।२८।
विशाखयूपभूपालः कल्केर्निर्याणमीदृशम् ।
श्रुत्वा स्वपुत्रं विषये नृप कृत्वा गतो वनम् ।२६।