कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextऊनविंश अध्याय-३ ] [ ४६७
तच्छ्रुत्वा ता प्रजाः सर्वा रुरुदुर्विस्महान्विताः ।
त प्राहु प्रणता पुत्रा यथा पितरमीश्वरम् ।१६।
भो नाथ मर्वधर्मज्ञ नास्मान्त्यक्तुमिहार्हसि
यत्र त्व तत्र तु वय याम प्रणतवत्सल ।१७।
प्रिया गृहा धनान्यत्र पुत्रा प्राणास्तवानुगाः ।
परत्रेह विशोकाय ज्ञात्वा त्वा यज्ञपूरुषम् ।१८।
इति तद्वचन श्रुत्वा सान्त्वयित्वा सद्गुक्तिभिः ।
प्रययौ क्लिन्नहृदयः पत्नीभ्या सहितो वनम् ।१९।
हिमालय मुनिगणैराकीर्णं जाह्नवीजलैः ।
• परिपूर्णं देवगणै सेवित मनस प्रियम् ।२०।
गत्वा विष्णु सुरगणैर्वृ तश्चा च्चनुर्भुज ।
उषित्वा जाह्नवीतीरे सस्मरात्मानमात्मना ।२१।
यह सुनकर सम्पूर्ण प्रजा अत्यन्त विस्मयमे पडकर रुदन करने लगी ।
जैसे पुत्र पिता से निवेदन करता है, वैसे वह प्रणाम करके उनसे बोली
।१६। प्रजा ने कहा—हे नाथ ! आप सभी धर्मों के जानने वाले हैं ।
आप प्रणतपाल को हम सब का परित्याग नही करना चाहिये । हे नाथ !
हम आपके साथ चलेगे ।१७। इस जगत् मे सभी को अपना धन, सन्तान
और घर ही अत्यन्त प्रिय है । आप यज्ञ पुरुष सभी के दुख और शोक
का शमन करने मे समर्थ हैं । यह जान कर हमारे प्राण भी आपका
अनुगमन करने के लिए इच्छुक हैं ।१८। प्रजा के यह वचन सुन कर
कल्किजी ने उन्हे श्रेष्ठ उपदेश देकर सान्त्वना प्रदान की और खेद-युक्त
मन से अपनी दोनो पत्नियो को साथ लेकर वन के लिए चल दिये ।१९।
वे गंगाजल से सम्पन्न, देवताओं और मुनियो से उपासित हृदय को
आनन्द देने वाले हिमालय पर्वत पर पहुँच कर देवताओ के मध्य
विराजमान हुए और चतुर्भुज विष्णु स्वरूप धारण करके अपने रूप का
स्मरण करने लगे ।२०-२१।