कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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निमित्त पुन, ललकारने लगे ।२६। तभी ब्रह्मा जी वहा आये और
कल्किजी से हाथ जोड कर बोले कि हे प्रभो ! यह कोक-विकोक शस्त्रा-
स्त्रो से मृत्यु को प्राप्त नही हो सकते ।२७। इन दोनो को एक समय मे
ही थप्पड मार कर इनका वध कर दीजिये । क्योकि जब तक यह दोनो
परस्पर एक दूसरे को देखेगे, तब तक इनकी मृत्यु सभव नही है । अत
आप इसी प्रकार इनको मारिये ।२८। ब्रह्माजीके वचन सुन कर कल्किजीने
शस्त्रास्त्र और वाहन का परित्याग कर दिया और दोनो दानवो के मध्य
पहुँच कर दोनो हाथो से एक साथ उन दोनो के वज्र के समान मुष्टिका-
प्रहार किया, जिससे उनका मस्तक चूर्ण हो गया ।२६। देवताओ के
लिए भयप्रद और सब जीवो का अनिष्ट करने मे तत्पर वे दोनो दानव
मस्तको के चूर्ण होने से टूट कर गिरते हुए पर्वत-शिखरो के समान
धरती पर आ गिरे ।३०।
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्य्यं गन्धर्वाप्सरसा गणा ।
ननृतुर्जगुस्तुष्टुबुश्च मुनय सिद्धचारणाः ।
देवाश्च कुसुमासारैर्ववर्षुर्हर्षमानसाः ।३१।
दिवि दुन्दुभयो नेदु प्रसन्नाश्चाभवन्दिश. ।
तयोर्वधप्रमुदितः कविद्दशसहस्रकान् ।
साश्वान्महारथान्साक्षाद्दहनद्दिव्यसायकै.
प्राज्ञः शतसहस्राणा योधना रणमूर्द्धनि ।
क्षय निन्ये सुमन्त्रस्तु रथिना पञ्चविंशतिः ।३३।
एवमन्ये गार्ग्यभर्ग्यविशालाद्या महारथान् ।
निजघ्नुः समरे क्रुद्धा निषादानम्लेच्छबर्बरान् ।३४।
एव विजित्य तान्सर्व्वान्कल्किर्भूपगणैः सह ।
शय्याकर्णेन भल्लाटनगरञ्जेतुमाययौ ।३५ः
नानावाद्यैर्लोकसङ्घैर्वरास्त्रैर्नानावस्त्रैर्भूषणैर्भूषिताङ्गः
नानावहेश्चामरैर्वीज्यमानैर्योतियोद्धु कल्किरत्युग्रसेन ३६
यह देख कर अत्यन्त आश्चर्य मे भरे गंधर्व और अप्सराएं