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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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Page 124

प्रथम-अध्याय ] [ ३७७
धनुषा पञ्चवर्षीय राक्षसं शस्त्रमाददे ।
तेनास्त्रेण शिरस्तस्य छित्वा भूमावपातयत् ॥४४॥
रुधिराक्तं धातुचित्रं गिरिशृङ्गमिवद्भुतम् ।
सपुत्रा राक्षसी हत्वा मुनीना वचनाद्विभुः ।०४५:।
जब विकज ने अपनी माता की यह दशा देखी तो वह क्रोध
से कातर होकर निरस्त्र ही सेना में घुस पडा ॥ ४१ ॥ उसके हृदय
मे हाथियो की माला, सब अंगो मे घोडो के आभूषण, मस्तक पर
महा-सर्प का मुकुट और अंगुलियो मे सिंहो की मुद्रिकाएँ थी ॥ ४२ ॥
वह अपनी माता के शोक से व्याकुल होकर कल्किजी की सेना का
उत्पीडन करने लगा । तब कल्किजीने उस पाँच वर्ष के राक्षस-बालक
को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र ग्रहण किया और उससे उसका मस्तक
काट कर पृथ्वी पर गिरा दिया ॥ ४३-४४ ॥ इस प्रकार मुनियो द्वारा
निवेदन करने पर कल्किजी ने गेरू आदि से चित्रित किये के समान उस
रक्ताक्त पर्वत पर पुत्र सहित राक्षसी को नष्ट कर दिया ॥४५॥
गङ्गातीरे हरद्वारे निवास समकल्पयत् ।
देवानां कुसुमासारैर्मुनिस्तोत्रैः सुपूजितः ॥४६॥
निनाय तां निशां तत्र कल्किः परिजनावृतः ।
प्रातर्ददर्श गङ्गायास्तीरे मुनिगणान्बहून् ।
तस्याः स्नानव्राजविष्णोरात्मनो दर्शनाकुजान् ॥४७॥
हरद्वारे गङ्गातटनिकटपिण्डारकवने ।
वसन्तं श्रीमन्तं निजगणवृतं तं मुनिगणाः ।
स्तवैः स्तुत्वा स्तुत्वा विधिवदुदितैर्जन्हुतनयां ।
प्रपश्यंतं कल्कि मुनिजलगणा द्रष्टुमगमन् ॥४८॥
तदनन्तर उन्होने देवताओ द्वारा पुष्प-वृष्टि और मुनियो के स्तोत्रो
से भले प्रकार पूजित होते हुए वहाँ चल कर हरिद्वार मे गङ्गा जी के