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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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प्रथम अध्याय-३ ] [ ३६८
इन्ही की आज्ञा से काल, स्वभाव, सस्कार तथा सजा आदि की
आश्रयभूता परा प्रकृति, महत्तत्त्व और अहकार आदि को उत्पन्न करने
मे समर्थ होती है ।२६। सर्ग, स्थिति और प्रलयात्मक यह सम्पूर्ण विश्व
जिनकी माया ही है, यह वही सबके आदि-रूप ईश्वर है । इनके द्वारा
ही लोक मे शुभाशुभ का प्रवर्तन होता है ।२७। यह मेरा पति है और
मै इसकी भार्या हूँ, यह मेरा पुत्र अथवा बान्धव है । ऐसे स्वप्न अथवा
इन्द्रजाल के समान विविध प्रकार के व्यवहार की उत्पत्ति इन्ही के द्वारा
होती है ।२८। स्नेह और मोहादि के बन्धन मे पड़े रह कर जो प्राणी
इस विश्व के आवागमन मे रहे आते हैं अथवा जो राग, द्वेष एव विद्वे-
षादि के आश्रय रहने वाले जीव तथा भगवान कल्कि की सेवा में अनु-
राग न रखने वाले हैं, वही इस जगत को सत्य मानते हैं ।२६। काल
कहा से आया ? मृत्यु कहाँ से उत्पन्न हुई ? यम तथा देवगण कौन हैं ?
यह कल्किजी के अतिरिक्त अन्य कोई नही है, यही अपनी माया के द्वारा
बहुरूप हो गए हैं ।३०।
न शस्त्राणि वय नार्थः सप्रहार्या न च क्वचित् ।
शस्त्र प्रहर्तृ भेदोऽयमविवेक परात्मन. ।३१।
कल्किदासस्यापि वय हन्तु नार्हा कथोद्‌भुनम् ।
हनिष्यामो दैत्यपते प्रह्लादस्य यथा हरिम् ।३२।
इत्यस्त्राणा वच. श्रुत्वा स्त्रियो विस्मितमानसा. ।
स्नेहमोहविनिर्मुक्तास्त कल्कि शरण ययुः ॥३३॥
ताः समालोक्य पद्‌मेशः प्रणता ज्ञाननिष्ठया ।
प्रोवाच प्रहसन् भक्ति-योग कल्मषनाशनम् ।३४।
हे स्त्रियो ! हम शस्त्र नहीं हैं, हम किसी पर आघात करने मे
भी समर्थ नही हैं । यही परमात्मा स्वय शस्त्र हैं और यही आघात करने
की शक्ति से सम्पन्न हैं । इनमे जो भेद प्रतीत होता है, वह सब इनकी
माया ही है ।३१। दैत्यराज प्रह्ल.द की प्रार्थना पर जब भगवान् विष्णु,