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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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Page 112

प्रथम अध्याय-२ ] [ ३६५
तेषा स्त्रियो रथारूढा गजारूढा विहङ्गमा ।
समारूढा हयारूढा खरोष्ट्रवृषवाहना ॥१।
योद्धु समाययुस्त्यक्त्वा पत्यापत्यसुखाश्रयान् ।
रूपवत्योऽतिबलवत्य पतिव्रता ।१२।
नानाभरणाभूषाढ्या सन्नधा विशदप्रभा ।
खड्गशक्तिधनुर्वाणवलयाक्तकराम्बुजा ।१३।
स्वैरिण्योऽप्यतिकामिन्यो पुंश्चल्यश्च पतिव्रता ।
ययुर्योद्धु कल्किसैन्ये पतीना निधनातुरा ।१४।
मृद्भस्मकाष्ठचित्राणा प्रभूताम्नायशासनात् ।
साक्षात्पतीना निधन कि युवत्योऽपि सेहिरे ।१५।
उन म्लेच्छो की रूपवती बलवती, पतिव्रता युवती स्त्रियाँ भी
सन्तान-सुख की और उनके आश्रय की कामना छोड कर कोई रथ पर
चढ कर, कोई हाथो पर चढ कर, कोई विहग पर चढ कर, कोई घोडे,
गधे, ऊँट पर, कोई बैल पर चढ कर युद्ध करने के लिए अपने-अपने
पति के पास पहुँची ।११-१२। इन्होने अनेक प्रकार के उज्ज्वल आभूषण
एव शस्त्रास्त्र धारण कर रखे थे। इनके हाथो मे कडो के साथ ही खड्ग
और बाण भी सुशोभित थे ।१३। सुन्दर लावण्यमयी यह स्त्रियाँ कोई
स्वैरिणी, कोई वार-विलासिनी अथवा कोई पतिव्रता थी । यह पति-
वियोग मे व्याकुल हुई स्त्रियाँ कलिक सेना से युद्ध करने को अग्रसर हुई
।१४। क्योकि मनुष्य मिट्टी, काष्ठ एव राख की वस्तु पर भी प्राण देने
मे तत्पर होजाते है, इसी प्रकार अपने प्राण के समान पति का मरण
सहन करना युवतियो के लिए भी सम्भव नही होता ।१५।
ता स्त्रिय रवपतोन्बाणैर्भिन्नान्व्याकुलेतेन्द्रियान् ।
कृत्वा पश्चाद्यु युधिरे कल्किसैन्यैधृतायुधा ।१६।
ताः स्त्रीरुद्वीक्ष्य ते सर्वे विस्मयस्मितमानसा ।
कल्किमागत्य ते योधाः कथयामासरादरात् ।१७।