कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context३६४ ] [ कल्कि पुराण
रक्तपात से लोहित की नदी बह चली, जिसमें केश सिवार जैसे लगने
लगे और अश्व रूपी ग्रह धार मे प्रवाहित होने लगे ।५।
धनुस्तरङ्गा दुष्पारा गजरोधः प्रवाहिणी ।
शिरःकूर्मा रथतरिः पणिमीनासृगापगा ।६।
प्रवृत्ता तत्र बहुधा हर्षयन्तो मनस्विनाम् ।
दुन्दुभेयरवा फेरुशकुनानन्ददायिनी ।७।
गजेर्गजा नरैरश्वा. खरैरुष्ट्रा रथे रथाः ।
निपेतुर्बाणभिन्नाङ्गा' छिन्नबाह्वङ्घ्रिकन्धरा ।८।
भस्मना गुण्ठितमुखा रक्तवस्त्रा निवारता. ।
विकीर्णकेशाः परितो तान्ति सन्यासिनो यथा ।६।
व्यग्रा केऽपि पलायन्ते याचन्त्यन्य जलं पुन, ।
कल्किसेनाशुगक्षुण्णा म्लेच्छा नो शर्म लेभिरे ।१०।
उस लोहित नदी मे धनुष तरंग के समान उछलने लगे, हाथी
इस नदी मे सेतु के समान लगते थे, कटे हुए शीश कछुआ के समान,
रथ नाव के समान और कटे हुए हाथ मछली के समान दिखाई देते थे
।६। लोहित नदी के किनारे गीदडो और बाज पक्षियो की हर्ष ध्वनि
दुंदुभि की ध्वनि जैसी लगती थी । उसे देख कर मनस्वी लोग हर्षित हो
उठे ।७। युद्ध क्षेत्र मे हाथी सवार हाथी सवार से, अश्वारोही अश्वारोही
से, ऊँट वाला ऊँट वाले से, रथ रथी से भिड़ा हुआ था । उस समय
बाणो से कट-कट कर हाथ, पाँव और मस्तक धरती पर गिर रहे थे
।८। बहुत से वीरो ने भयभीत होकर गेरुए वस्त्र धारण कर, भस्म रमा
ली तथा विकीर्ण केश होकर संन्यासी बन कर रोके जाने पर भी पला-
यन कर गये ।६। कोई-कोई विकल होकर भागा, कोई जल माँगता रहा ।
इस प्रकार कल्कि-सेना के बाणो की मार से कोई म्लेच्छ वीर सकुशल
न रहा ।१०।