कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextषष्ठम अध्याय-२ ] [ ३५३
जी ने अपने पिता को अश्वमेध यज्ञ के अनुष्ठान मे ब्रह्माजी के समान
तत्पर देखकर कहा— हे पिता जी ! मैं दिक्पालो को जीत कर धन एकत्र
करूँगा, जिससे आपका अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न होगा । अब मैं दिग्विजय
के लिए प्रस्थान करता हूँ । ३७-३६। शत्रु-पुर पर विजय प्राप्त करने
वाले कल्किजी ने यह कह कर प्रसन्नतापूर्वक अपने पिता को प्रणाम
किया और सेना को साथ लेकर कीकटपुर की ओर चल दिये ।४०।
बुद्धालय सुविपुल वेदधर्मबहिष्कृतम् ।
पितृदेवार्चनाहीन परलोकविलोपकम् ।४१।
देहात्मवादबहुल कुलजातिविवर्जितम् ।
धने स्त्रीभिर्भक्ष्यभोज्यै. स्वपराभेददर्शिनम् ।४२।
नानाजनैः परिवृत पानभोजनतत्परैः ।४३।
श्रुत्वा जिनो निजगणै कल्केरागमन क्रुधा ।
अक्षौहिणीभ्या सहित. सबभूव पुराद्बहिः ।४४।
गजरथतुरगै समाचिता भू कनक विभूषणभूषितैर्वराङ्गै ।
शत शतरथिभिधृतास्त्रशस्त्रै.। ध्वजपटराजि-
निवारितातपर्विभो सा ॥४५॥
अत्यन्त विस्तार वाला कीकटपुर बौद्धों का निवास स्थान था ।
यहाँ रहने वाले व्यक्ति वैदिक धर्म तथा देवता और पितरो के अर्चन से
हीन और परलोक के न मानने वाले थे ।४१। यह लोग देहात्मवादी,
कुल धर्म और जाति धर्म के न मानने वाले तथा धन, स्त्री और भोज-
नादि मे अभेद देखने वाले थे ।४२। पान एव भोजन मे ही व्यस्त रहने
वाले विविध प्रकार के मनुष्यो से ही यह नगर परिपूर्ण था ।४३। वहाँ के
अधिपति जिन ने जब युद्ध के अभिप्राय से सेना सहित कल्किजी का आग-
मन सुना तो वह प्रतीकारार्थ दो अक्षौहिणी सेना को लेकर नगर से
बाहर आया ।४४। असंख्य हाथी, रथ, अश्व स्वर्ण के आभूषणों से
भूषित श्रेष्ठ रथी और शस्त्रास्त्रधारी वीरो से पृथिवी ढक गई । सेनाओ
के ध्वजो से धूप भी रुक गई ।४५।