सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

[दक्ष यज्ञ-भंग वर्णन]

८८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
थी। वह ऊपर की ओर भुजाओं को किए हुए विशेष क्रन्दन करती हुई
कम्प से संयुत होती हुई भूमि पर गिर गयी थी।
[दक्ष यज्ञ-भंग वर्णन]
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसी बीच में भगवान् शम्भु परम शोभन
मानस हृद में सन्ध्या वन्दना को समाप्त करके आश्रम की ओर आये
हुए थे। वृषभध्वज ने विजया के परम दारुण रूदन की ध्वनि को आते
हुए ही श्रवण किया था और फिर वे चकित हो गये थे। इसके अनन्तर
भगवान् शम्भु बलवान मन और मारुत के वेग से त्वरान्वित होकर शीघ्र
ही अपने आश्रम के स्थान पर प्राप्त हो गए थे। उस समय में हर ने
प्यारी दाक्षायणी देवी को मृता देखकर भी अत्यधिक प्रियभाव से मृत
होने पर भी त्याग नहीं किया था। इसके उपरान्त मुख को देखकर और
बार-बार आमृजन करके यह सोई है इसी प्रकार से दाक्षायणी से
बार-बार कैसे पूछा था। इसके उपरान्त भर्ग के वचन का श्रवण करके
उसकी बहन-पुत्री विजया ने जिस रीति से दाक्षायणी का निधन
कहा था।
विजया ने कहा-हे शम्भु! प्रजापति दक्ष के यज्ञ करने के लिए इन्द्र
सहित सभी देवों को बुलाया था तथा दैत्यों, राक्षसों, सिद्धों और
गुह्यकों को भी बुलाया था। ब्राह्मणों, श्री गोविन्द और इन्द्रादिक्
पतियों को भी उस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए बुलाया था तथा
देवयोनि को और समस्त साध्य तथा विद्याधरों को भी बुलाया था। हे
शंकर! जो सत्व थे उसने उनको आहूत नहीं किया था जो कि समस्त
भुवनों में भीं हैं। यह दाक्षायणी इस प्रकार से प्रवर्त्तित यज्ञ के विषय
में श्रवण करके जो कि मेरे वचन से ही श्रवण किया था उसने भगवान्
शम्भु का और अपने न बुलाने के हेतु के विषय में विचार किया था।
मैंने जैसे भी सुना था उसी के अनुसार चिन्ता करती हुई उस सती का
ज्ञान प्राप्त करके, हे भूतेश मैंने ही यज्ञ में न बुलाने का कारण कहा
था। वह कारण यही था कि दक्ष ने सोचा था कि भगवान् शम्भु

൵८ श्रीकालिका पुराण ൵८ ८९
कपाल के धारण करने वाले हैं और उसकी पत्नी भी उनके ही संग होने
के कारण से विशेष गर्विता हो गयी हैं । अतएव शम्भु और सती भी
मेरे यज्ञ में शामिल नहीं होंगे । यही न बुलाने का हेतु मैंने पहले ही
अपनी पत्नी वीरणी को उस मन्दिर में बोलते हुए दक्ष के मुख से ही
सुना था । यही मेरे वचन का श्रवण करके वह सती कान्तिहीन मुख
वाली होकर भूमि में बैठ गई थी । वह कोप परायण होती हुई मुझसे
भी कुछ नहीं बोली थी ।
हे हर! उसी क्षण उसका मुख क्रोध से युक्त हो गया था और
उसकी भृकुटियाँ टेढ़ी हो गई थी तथा उसका मुख ऐसा श्याम पड़ गया
था जैसा कि धूमकेतु से आकाश हो जाया करता है । उसने थोड़ी ही
देर तक ध्यान करके उसने महान् स्फोट से अपने मस्तक का भेदन कर
अपने प्रिय प्राणों का उत्सर्जन कर दिया अर्थात् मृत हो गई थी
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-वृषभध्वज ने विजया के इस वचन का श्रवण
करके वे अत्यधिक कोप से प्रज्ज्वलित अग्नि की ही भाँति उत्थित हो
गये थे । अत्यधिक कोप से आकुल उनके कान्त, चक्षु, नासिका और
मुख से अग्नि की महती ध्वनि का सृजन करती हुई परमघोर जलती हुई
कणिकायें निकली थीं । कल्प के अन्त में आदित्य के वर्चस वाली
बहुत सी उल्कायें विनिःसृत हो गई थी । इसके अनन्तर वे शम्भु वह
पर बहुत ही शीघ्र चले गए थे जहाँ पर महान् तपस्वी दक्ष विद्यमान थे
और यज्ञ कर रहे थे । महान् कोप से आवृत्त होकर भर्ग ने उस यज्ञ क
अवलोकन किया था जो महान् धन के वैभव से सुसम्पन्न थे और पाः
धूप आदि युक्त था । वह यज्ञ हवन किया हुए आज्य से वृद्धि युक्त
था तथा दीप्त हुई वह्नि से विराजित हो रहा था । शम्भु ने समुचि
स्थानों पर संस्थित आयुधों और ध्वजों से युक्त सब दिक्पालों क
देखा था ।
उस यज्ञ के मध्य में विधाता की ओर व्यवस्थित भगवान् विष्णु क
भी अवलोकन किया था । उन सबको देखकर अतीव कोप से शम्
कुपित हो गये थे । अपनी-अपनी भार्याओं के सहित भग, सूर्य, सोम

९० શ્રીકાલિકા પુરાણ
सहस्राक्ष, गौतम, पूर्व भाग में अवस्थित सनत्कुमार, आत्रेय, भार्गव,
विनतासुता, मरुद्गण साध्य, आग्नेय जातवेदा को देखा था। काल,
चित्रगुप्त, कुम्भयोनि, गालव, समस्त विश्वेदेवा, कव्यवाह आदि पितृगणों
को देखा था। समस्त अग्निष्वात आदिक को और चारों प्रकार के
भूतग्राम को, सौम, प्रेतगणों को, दक्षिण दिशा में अवस्थित सिद्धों को
देखा था। वहाँ पर शम्भु ने राक्षसों को, पिशाचों को, भूतों को, मृग,
पक्षियों को, कव्यादों को, क्षुद्र जन्तुओं को तथा पुण्य जनेश्वर को देखा
था। महर्षि मौद्गल को, नैऋत्य दिशा में राहु को तथा किन्नरों को,
महारों को, नक्रों को, मत्स्यों को, ग्राहों को, कच्छपों को, सात समुद्रों
को, सिन्धु को, नदियों को, तीर्थों को और गुह्यकों को देखा था।
मानस आदि सब मनुओं को तथा गंगा नदियों को, कामदेव को,
मधु को, बसन्त को और अनुगों के सहित वरुण को देखा था।
शनैश्चर को, समस्त पर्वतों को जो पश्चिम दिशा में व्यवस्थित थे।
प्राणादि पाँचों वायुओं और गणों के सहित समीरण को, कल्पद्रुमों को,
हेमवान् पर्वत को और महामुनि कश्यप को देखा था। वायव्य दिशा में
कमल व्रति को और फलों को तथा कलानिधि को, अनेक रत्नों को,
हेमों को, मनुष्यों को तथा पर्वतों को देखा था। हिमाद्रि जिनमें प्रमुख
था और यज्ञ, स्थूल, कर्णादि, बुध, नर, कुबेर के सहित नरवाह
यक्षराज, ध्रुव, धर और सोम, विष्णु, अनिल और अनल, प्रत्यूष, प्रभास
इन सबको कौवेरी दिशा में समवस्थित हुए देखा था। वृषभध्वज के बिना
समस्त रुद्रों को, जीवों को तथा मनुओं को, विविध बाहु से संजात
वैश्यों को और सभी ओर शूद्रों को देखा था। ऐशानी दिशा में विविध
भाँति के अन्नों को, ब्रीहियों को, तिलों को भी देखा था। ऐशानी और
पूर्व दिशा के मध्य में सशत व्रतों से संयुत ब्रह्मर्षियों को देखा था।
चारों महर्षियों को, वेदों को और छै वेदों के अंगों को देखा था।
नैऋत्य और पश्चिम दिशा के अन्तःस्थित आनन्द श्वेत पर्वत को देखा
था। सहस्र काद्रवेय के सहित सात भोगियों को, वहाँ पर ही केतु की
ओर डाकिनियों से समन्वित कूष्माण्ड को देखा था तथा नाना वर्णों से

൵७२ श्रीकालिका पुराण ൵७३ ९१
संयुत तथा विद्युत् के सहित अन्य जलधरों को वहीं पर स्थित दिग्गजों
को, जिनमें ऐरावत प्रमुख था भगवान् हर ने देखा था। यथास्थान पर
दिक्करिणी से समन्वित सबको देखा था। महान् धन से संयुत उस यज्ञ
को दूर ही से देखकर शिव ने वीरभद्र नामक गण को शीघ्र ही उसकी
ओर प्रेषित किया था। वह वीरभद्र महागण भी बहुत से अनेक गणों
संवृत हुआ था। उसने महात्मा दक्ष के यज्ञ का फिर ध्वंस कर दिया
था। उस महान् यज्ञ के विध्वंस करते हुए वीरभद्र को देखकर समस्त
देवगणों से आवृत भगवान् वैकुण्ठ ने वरण किया था। उनको निवारण
करते हुए देखकर ही ईश्वर के लोचन क्रोध से लाल हो गये वे फिर
ईश्वर स्वयं ही उस महायज्ञ में प्रविष्ट हो गये थे और उस यज्ञ का
ध्वंस कर दिया था।
भग आगे से ही उस यज्ञ में प्रवेश करते हुए उनको सर्वप्रथम
देखकर अपनी बाहुओं को फैलाकर भगत्त्वरा से संयुत होकर भगवान्
भूतेश के पास गया था। उसको सामने आते हुए देखकर भगवान् भर्ग
भी अत्यन्त कुपित हो गये थे और अपनी अंगुलि के अग्रभाग के प्रहार
से उन्होंने उस भग के नेत्रों का हनन कर दिया था। नेत्रों से हीन
विरुपाक्ष भग को देखकर दिवाकर से त्वरायुक्त होते हुए स्पर्धा करने
वाले भगवान् शर्व के समीप आये थे। इसके उपरान्त महादेव ने सूर्य
को कर से पकड़कर हाथ से दूर हटाकर अत्यन्त क्रोध युक्त होकर उस
यज्ञ की ओर ही धावमान हो गये थे। मार्त्तण्ड (सूर्य) हँसते हुए बड़े
वेग के साथ दोनों बाहुओं को फैलाकर कहने लगा आओ, मैं तुम्हारे
साथ युद्ध करूँगा। इतना कहकर सूर्य ने उस शिव को आगे चलकर
फिर रोक दिया था। हँसते हुए उस सूर्य के दाँतों को वृषभध्वज ने
क्रोधयुत होकर हाथ के ही प्रहार से मुख से गिरा दिया था। इस प्रकार
से सूर्य को बिना दाँतों वाला तथा भग को हीन मन्त्रों वाला देखकर
समस्त देवगण, ऋषि लोग और जो भी वहाँ पर अन्य थे वे सब भाग
गये थे।
भगवान् सब देवगण आदि को भागकर परमाधिक कोप वाले होते

९२ ੴ श्रीकालिका पुराण ੴ
हुए वे मृग के रूप से अपमान करते हुए उस यज्ञ को ही पकड़ने के
लिए पीछे दौड़े थे । वह यज्ञ भी आकाश के मार्ग के द्वारा ब्रह्मस्थान
में प्रवेश कर गया था । वृषभध्वज भी उसके पीछे से कुपित होते हुए
ब्रह्मस्थान को गमन कर गये थे । भर्ग से डरा हुआ यज्ञ ब्रह्मा के कहने
पर नीचे उतर आया था और अवतरित होकर अपनी माया से सती के
देह में प्रवेश कर गया था । भगवान् भर्ग भी मृत हुई दक्ष की दुहिता
के निकट चले गये थे उस समय में भर्ग पीछे हो गए थे और वहाँ पर
यज्ञ तथा सती के शव को उन्होंने देख लिया था । उस समय भगवान्
हर ने दाक्षायणी देवी सती को मृता देखकर यज्ञ को भूलकर उसके
समीप में स्थित हुए उन्होंने बहुत अधिक उस सती के विषय में शोक
किया था । शूलपाणि भगवान् शम्भु अनेक प्रकार के सती के गुण
गणों का चिन्तन करते हुए उस देवी सती की परमाधिक सुन्दर दाँतों
की पंक्ति को, कमल के समान प्रकाशित मुख को, अरुण दर्शन वस्त्र,
उसकी दोनों भृकुटियों के जोड़े को देखकर बहुत ही तीव्रतर शोक से
व्याकुल होकर रुदन करने लगे थे ।
विजया सखी के शोक विचार
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- उस अवसर पर भगवान शिव दक्षा के
गुणगणों को परिगणन करते हुए हुए अत्यधिक दुःख से प्रपीड़ित
होकर प्राकृत मनुष्य की ही भाँति शोकाकुल हो गये थे । उस समय में
विलाप करते हुए शिव को जानकर अर्थात् सती के वियोग में शम्भु को
रुदन करते हुए देखकर कामदेव, रति और बसन्त के सहित महेश्वर प्रभु
के समीप में प्राप्त हो गया था । उस रति के पति कामदेव ने शोक से
अत्यन्त परिभ्रष्ट उस शम्भु को जो भ्रष्ट चेतना वाले और रुदन करने
वाले थे, एक ही साथ अपने पाँचों बाणों से प्रहार किया था। शोक
के कारण अभिहत चित्त वाले भी शम्भु कामदेव के बाणों के प्रहार
से व्याकुल होकर अत्यन्त ही संकीर्ण भाव को प्राप्त हो गये थे और
उन्होंने बहुत शोक किया था और वे मोह को भी प्राप्त हो गये थे

श्रीकालिका पुराण ९३
अर्थात् शोक के वेग से मूर्छित हो गये थे । वे एक क्षण में तो
शोकाकुल होकर भूमि पर गिर जाया करते थे और एक क्षण में ही
उठकर दौड़ लगाते थे । एक ही क्षण में वे भ्रमण करने लगते थे अथवा
चक्कर काटा करते थे और फिर वे विभु वहीं पर अपने नेत्रों को
निमीलित कर लिया करते थे। किसी समय में देवी दाक्षायणी का
ध्यान करते हुए हास करने वाले हो जाते थे अर्थात् खूब अधिक हँसते
रहा करते थे। किसी समय में भूमि में लेटी हुई उस सती का आलिंगन
किया करते थे मानों वह रस के भावों से युक्त ही स्थित होवे । भगवान
शंकर 'हे सती! हे सती!' इस प्रकार से निरन्तर सती के नाम का कथन
करके ऐसा कहा करते थे कि अब इस व्यर्थ में किए हुए नाम का
परित्याग कर दो। ऐसा कहकर अपने हाथ से उस सती के शव का
स्पर्श किया करते थे। शम्भु भगवान् अपने हाथ से इस सती का
परिमार्जन करके उसके यथास्थित अलंकारों को विश्लेषित करके
अर्थात् शरीर से दूर करके फिर उन अलंकारों को वहाँ पर ही अर्थात्
उस सती के मृत शरीर पर अलंकारित किया करते थे। तात्पर्य यह है
कि कभी तो आभूषणों को सती के मृत शव से दूर हटा लेते थे और
उसी सती को सजीव समझकर आभूषणों को उनके अंगों में धारण
कराया करते थे।
भूतेश्वर भगवान् शम्भु के इस प्रकार से विलाप-कलाप करने पर
भी जिस समय में वह मृत हुई सती ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया था तो
उस समय भगवान् शिव शोक की उद्गाढ़तापूर्वक अत्यधिक रूदन
करने लगे थे। जब वे रूदन कर रहे थे तो उसके आँसू नीचे गिर रहे
थे। उस समय में देवगण ने उसको देखा था और वे ब्रह्मादिक देव
चिन्ता में परायण होते हुए अत्यधिक चिन्तातुर हो गये थे । भूमि पर
गिरे हुए ये वाष्पक अर्थात् आँसू यदि पृथ्वी का दाह कर देंगे तो वहाँ
पर क्या उपाय करना चाहिए अर्थात् इन आँसुओं के द्वारा पृथ्वी का
दाह का क्या प्रीतकार होगा इससे ये सभी हा-हाकार करने लगे थे ।
इसके अनन्तर ब्रह्मादिक देवों के शनैश्चर के साथ विचार किया था

९४ ∾ श्रीकालिका पुराण ∾
और उन्होंने भगवान् शम्भु के जो मोह के वशीभूत हो गए थे वाष्पों को
धारण करने हेतु शनैश्चर का स्तवन किया था। देवगण ने कहा-हे
महान् भाग्य वाले! हे शनैश्चर देव! आप तो लोकों पर अनुग्रह करने
वाले हैं। हे मूलशक्ति से समुत्पन्न होने वाले! आपका जन्म तो सूर्यदेव
से ही हुआ है। आपके लिए हमारा नमस्कार समर्पित है। हाथ में शूल
धारण करने वाले, पाश को धारण करने वाले और धनुर्धारी आपको
नमस्कार है। आपका हस्त वरदान देने वाला है और अन्य तम की
छाया के आत्मज हैं-ऐसे आपको नमस्कार है।
हे नील मेघ के सदृश! आप पिसे हुए अञ्जन के तुल्य हैं। समस्त
लोकों के प्राणों के धारण करने में कारणस्वरूप आपके लिए प्रणाम।
आपको नमस्कार होवे। हे भगवान्! आप शीघ्रतापूर्वक प्रसन्न हो
जाइए। भगवान् शम्भु के शोक से समुत्पन्न हुए वाष्पों आँसुओं से
हमारी इस पृथिवी की रक्षा करो। जिस प्रकार से पुरातन समय में वर्षों
तक वृष्टि का अवरोध किया था और आप ही ने मेघों से होने वाली
वृष्टि को रोक दिया था अब उसी भाँति भगवान् हर के शोक के गिरे
हुए वाष्पों के जल में भी कीजिए। अर्थात् इस आँसुओं के जल को
भी रोक दीजिए। आपके द्वारा जलों का ग्रहण करना देखकर पुष्कर
आदि उन मेघों ने महेन्द्र की आज्ञा से निरन्तर वर्षा को छोड़ा था अर्थात्
सतत वृष्टि करते रहे थे। आपने पहले पूर्व समय में उस सम्पूर्ण वर्षा
के जल को आकाश ही में विनष्ट कर दिया था। अब उसी भाँति
भगवान् शिव के आँसुओं के जल को भी नष्ट करने के लिए प्रयत्न
कीजिए। भगवान् शिव के वाष्पों के निवारण करने के कार्य से अन्य
कोई भी आपके बिना सामर्थ्य रखने वाला नहीं है। यह शिव के शोक
से समुत्पन्न आँसुओं का जल देव गन्धर्वों के सहित तथा पर्वतों के
सहित ब्रह्मलोकों का दाह कर देगा। ऐसी ही इन आँसुओं के जल में
दाहकशक्ति विद्यमान है। वह वाष्पों का जल इस भूमण्डल में गिरा है
इसलिए आप अपनी माया से इनको धारण करो।
मार्कण्डेय ऋषि ने कहा- समस्त देवों द्वारा इस प्रकार से भाषण

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ९५
किए जाने पर सूर्य पुत्र शनैश्चर ने अत्यन्त दयार्द्र मन वाला होकर उन
देवों को प्रत्युत्तर दिया था। शनैश्चर ने कहा-हे सुरों में श्रेष्ठों! अपनी
शक्ति के अनुसार ही आपका कार्य करूँगा किन्तु ऐसी ही होना चाहिए
कि दाह करने वाले मुझको भगवान् शम्भु न जान लेवें। महान् दुःख
और शोक के व्याकुल वाष्पधारी शिव के समीप में उनके कोप से यदि
वह जान लेंगे तो मेरा शरीर निश्चय ही नष्ट हो जायेगा-इसमें लेशमात्र
भी संशय नहीं है। इस कारण से ऐसा ही करिए कि जिस प्रकार से
सती के पति भूतेश्वर शिव मुझको न जान पावें और उनके नेत्रों से मैं
पृथक ही बना रहूँ। मार्कण्डेय मुनि ने कहा- इसके पश्चात् वहाँ से
ब्रह्मा आदि समस्त देवता शंकर के समीप में गये थे और सांसारिक
योगमाया के द्वारा शम्भु को उन्होंने पुनः अधिक मोहित कर दिया था।
शनैश्चर भी उसी समय भूतेश्वर के समीप में पहुंच गया था और उस
दुराधर्म वाष्पों की वृष्टि को माया से रोक दिया था। जब ऐसी स्थिति
उत्पन्न हो गई थी तो वह शनैश्चर भी शम्भु के वाष्पों को धारण करने
में असमर्थ हो गया था तो उसके द्वारा जलधारक महागिरि पर वे वाष्प
प्रक्षिप्त किय गये थे।
लोकालोक पर्वत के समीप में जलधारा वाष्प वाला गिरि है जो
पुष्कर द्वीप के पृष्ठ में स्थित है। वह तोय सागर के पश्चिम में है। वह
सब परिमाण से मेरु पर्वत के सदृश है। उस समय में असमर्थ शनैश्चर
ने उस पर ही वाष्पों को विन्यस्त कर दिया था। वह पर्वत भी शम्भु
के उन वाष्पों को धारण करने में समर्थ नहीं हुआ था। उन वाष्पों के
समुदायों से वह पर्वत विदीर्ण हो गया था और शीघ्र ही मध्य भाग में
भग्न हो गया था। उन वाष्पों ने उस पर्वत का भेदन करके वे फिर तोय
सागर में प्रवेश कर गये थे। वे वाष्प अतीव क्षार थे कि वह सागर भी
ग्रहण करने में समर्थ नहीं हुआ था। इसके अनन्तर सागर को मध्य में
भेदन करके वे वाष्प सागर की पूर्व में रहने वाली बेला पर समागत हो
गये थे तथा स्पर्श मात्र से उन्होंने उस बेला का भेदन कर दिया था।
पुष्कर द्वीप के मध्य में गमन करने वाले ने वाष्प बेला का भेदन करके