कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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हर ! आप शोक का परित्याग कर दीजिए । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस
रीति से साम के द्वारा स्तुति किए गए शम्भु ने अपने वाँछित का
संस्मरण करके भी सती के शोक से बिना कृत हुए शिव ने उस समय
में आत्मा का अवधारण नहीं किया था । नीचे की ओर को मुख किए
हुए समवस्थित ब्रह्माजी को देखकर उसने धीरे से यह कहा था-हे
ब्रह्माजी ! कुछ अतिक्रमण करनेवाली बात कहो । आप बतलाओ, अब
मैं क्या करूँ ।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस प्रकार से वामदेव और समस्त देवों
के द्वारा कहे हुए विधना (ब्रह्मा) उस समय मे महेश्वर के शोक का
विनाश करने वाला यह वचन कहा था । ब्रह्माजी ने कहा-हे महादेव !
अपनी आत्मा के द्वारा ही अर्थात् अपने-आप ही अपनी आत्मा अर्थात्
अपने वास्तविक स्वरूप का संस्मरण करके शोक का परित्याग कर
दो । आप शोक करने के स्थान नहीं हैं। शोक से आपका परम अन्तर
हो गया है। हे भूतेश्वर ! आपके शोकयुक्त हो जाने पर सभी देवगण
अत्यन्त भयभीत हो गए हैं । आपका क्रोध और शोक जगती-तल को
भ्रंश कर देगा और आपका शोक इसका शोषण कर देगा। आपके
वाष्पों अर्थात् अश्रुपात से यह सम्पूर्ण पृथ्वी व्याकुल होकर विदीर्ण हो
जाती यदि शनि आपके वाष्पों को अवग्रहण नहीं करता। वह शनि भी
हठ से कृष्ण हो गया है। जहाँ पर गन्धर्वों के सहित सब देवगण सदा
उत्सुकता से युक्त होकर क्रीड़ा किया करते हैं। जो यह सुमेरु पर्वत के
सदृश मान से उत्तम पर्वत हैं-पुष्कर, आवर्त्तक आदि जलों का पान
किया करते थे-जहाँ पर जा करके महामुनि कुम्भयोनि मन्दार पर्वत से
निरन्तर जगत के हित में तपस्या किया करते थे।
जिस पर्वत में भगवान् शम्भु स्थित होकर पूर्व में जल के सागर को
हाथ के मध्य में रखकर तप के बल से पी गये थे । शनैश्चर के द्वारा
आपके वाष्पों को सहन करने में असमर्थ होते हुए क्षिप्त लोकों से यह
जलधारा नामक गिरि विदारित हो गया था । हे शम्भो ! आप वाष्प
पर्वत का विशेष रूप से भेदन करके सागर में चले गये थे। वे प्रभीत