कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ९५
किए जाने पर सूर्य पुत्र शनैश्चर ने अत्यन्त दयार्द्र मन वाला होकर उन
देवों को प्रत्युत्तर दिया था। शनैश्चर ने कहा-हे सुरों में श्रेष्ठों! अपनी
शक्ति के अनुसार ही आपका कार्य करूँगा किन्तु ऐसी ही होना चाहिए
कि दाह करने वाले मुझको भगवान् शम्भु न जान लेवें। महान् दुःख
और शोक के व्याकुल वाष्पधारी शिव के समीप में उनके कोप से यदि
वह जान लेंगे तो मेरा शरीर निश्चय ही नष्ट हो जायेगा-इसमें लेशमात्र
भी संशय नहीं है। इस कारण से ऐसा ही करिए कि जिस प्रकार से
सती के पति भूतेश्वर शिव मुझको न जान पावें और उनके नेत्रों से मैं
पृथक ही बना रहूँ। मार्कण्डेय मुनि ने कहा- इसके पश्चात् वहाँ से
ब्रह्मा आदि समस्त देवता शंकर के समीप में गये थे और सांसारिक
योगमाया के द्वारा शम्भु को उन्होंने पुनः अधिक मोहित कर दिया था।
शनैश्चर भी उसी समय भूतेश्वर के समीप में पहुंच गया था और उस
दुराधर्म वाष्पों की वृष्टि को माया से रोक दिया था। जब ऐसी स्थिति
उत्पन्न हो गई थी तो वह शनैश्चर भी शम्भु के वाष्पों को धारण करने
में असमर्थ हो गया था तो उसके द्वारा जलधारक महागिरि पर वे वाष्प
प्रक्षिप्त किय गये थे।
लोकालोक पर्वत के समीप में जलधारा वाष्प वाला गिरि है जो
पुष्कर द्वीप के पृष्ठ में स्थित है। वह तोय सागर के पश्चिम में है। वह
सब परिमाण से मेरु पर्वत के सदृश है। उस समय में असमर्थ शनैश्चर
ने उस पर ही वाष्पों को विन्यस्त कर दिया था। वह पर्वत भी शम्भु
के उन वाष्पों को धारण करने में समर्थ नहीं हुआ था। उन वाष्पों के
समुदायों से वह पर्वत विदीर्ण हो गया था और शीघ्र ही मध्य भाग में
भग्न हो गया था। उन वाष्पों ने उस पर्वत का भेदन करके वे फिर तोय
सागर में प्रवेश कर गये थे। वे वाष्प अतीव क्षार थे कि वह सागर भी
ग्रहण करने में समर्थ नहीं हुआ था। इसके अनन्तर सागर को मध्य में
भेदन करके वे वाष्प सागर की पूर्व में रहने वाली बेला पर समागत हो
गये थे तथा स्पर्श मात्र से उन्होंने उस बेला का भेदन कर दिया था।
पुष्कर द्वीप के मध्य में गमन करने वाले ने वाष्प बेला का भेदन करके