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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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श्रीकालिका पुराण ९३
अर्थात् शोक के वेग से मूर्छित हो गये थे । वे एक क्षण में तो
शोकाकुल होकर भूमि पर गिर जाया करते थे और एक क्षण में ही
उठकर दौड़ लगाते थे । एक ही क्षण में वे भ्रमण करने लगते थे अथवा
चक्कर काटा करते थे और फिर वे विभु वहीं पर अपने नेत्रों को
निमीलित कर लिया करते थे। किसी समय में देवी दाक्षायणी का
ध्यान करते हुए हास करने वाले हो जाते थे अर्थात् खूब अधिक हँसते
रहा करते थे। किसी समय में भूमि में लेटी हुई उस सती का आलिंगन
किया करते थे मानों वह रस के भावों से युक्त ही स्थित होवे । भगवान
शंकर 'हे सती! हे सती!' इस प्रकार से निरन्तर सती के नाम का कथन
करके ऐसा कहा करते थे कि अब इस व्यर्थ में किए हुए नाम का
परित्याग कर दो। ऐसा कहकर अपने हाथ से उस सती के शव का
स्पर्श किया करते थे। शम्भु भगवान् अपने हाथ से इस सती का
परिमार्जन करके उसके यथास्थित अलंकारों को विश्लेषित करके
अर्थात् शरीर से दूर करके फिर उन अलंकारों को वहाँ पर ही अर्थात्
उस सती के मृत शरीर पर अलंकारित किया करते थे। तात्पर्य यह है
कि कभी तो आभूषणों को सती के मृत शव से दूर हटा लेते थे और
उसी सती को सजीव समझकर आभूषणों को उनके अंगों में धारण
कराया करते थे।
भूतेश्वर भगवान् शम्भु के इस प्रकार से विलाप-कलाप करने पर
भी जिस समय में वह मृत हुई सती ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया था तो
उस समय भगवान् शिव शोक की उद्गाढ़तापूर्वक अत्यधिक रूदन
करने लगे थे। जब वे रूदन कर रहे थे तो उसके आँसू नीचे गिर रहे
थे। उस समय में देवगण ने उसको देखा था और वे ब्रह्मादिक देव
चिन्ता में परायण होते हुए अत्यधिक चिन्तातुर हो गये थे । भूमि पर
गिरे हुए ये वाष्पक अर्थात् आँसू यदि पृथ्वी का दाह कर देंगे तो वहाँ
पर क्या उपाय करना चाहिए अर्थात् इन आँसुओं के द्वारा पृथ्वी का
दाह का क्या प्रीतकार होगा इससे ये सभी हा-हाकार करने लगे थे ।
इसके अनन्तर ब्रह्मादिक देवों के शनैश्चर के साथ विचार किया था