कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context९२ ੴ श्रीकालिका पुराण ੴ
हुए वे मृग के रूप से अपमान करते हुए उस यज्ञ को ही पकड़ने के
लिए पीछे दौड़े थे । वह यज्ञ भी आकाश के मार्ग के द्वारा ब्रह्मस्थान
में प्रवेश कर गया था । वृषभध्वज भी उसके पीछे से कुपित होते हुए
ब्रह्मस्थान को गमन कर गये थे । भर्ग से डरा हुआ यज्ञ ब्रह्मा के कहने
पर नीचे उतर आया था और अवतरित होकर अपनी माया से सती के
देह में प्रवेश कर गया था । भगवान् भर्ग भी मृत हुई दक्ष की दुहिता
के निकट चले गये थे उस समय में भर्ग पीछे हो गए थे और वहाँ पर
यज्ञ तथा सती के शव को उन्होंने देख लिया था । उस समय भगवान्
हर ने दाक्षायणी देवी सती को मृता देखकर यज्ञ को भूलकर उसके
समीप में स्थित हुए उन्होंने बहुत अधिक उस सती के विषय में शोक
किया था । शूलपाणि भगवान् शम्भु अनेक प्रकार के सती के गुण
गणों का चिन्तन करते हुए उस देवी सती की परमाधिक सुन्दर दाँतों
की पंक्ति को, कमल के समान प्रकाशित मुख को, अरुण दर्शन वस्त्र,
उसकी दोनों भृकुटियों के जोड़े को देखकर बहुत ही तीव्रतर शोक से
व्याकुल होकर रुदन करने लगे थे ।
विजया सखी के शोक विचार
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- उस अवसर पर भगवान शिव दक्षा के
गुणगणों को परिगणन करते हुए हुए अत्यधिक दुःख से प्रपीड़ित
होकर प्राकृत मनुष्य की ही भाँति शोकाकुल हो गये थे । उस समय में
विलाप करते हुए शिव को जानकर अर्थात् सती के वियोग में शम्भु को
रुदन करते हुए देखकर कामदेव, रति और बसन्त के सहित महेश्वर प्रभु
के समीप में प्राप्त हो गया था । उस रति के पति कामदेव ने शोक से
अत्यन्त परिभ्रष्ट उस शम्भु को जो भ्रष्ट चेतना वाले और रुदन करने
वाले थे, एक ही साथ अपने पाँचों बाणों से प्रहार किया था। शोक
के कारण अभिहत चित्त वाले भी शम्भु कामदेव के बाणों के प्रहार
से व्याकुल होकर अत्यन्त ही संकीर्ण भाव को प्राप्त हो गये थे और
उन्होंने बहुत शोक किया था और वे मोह को भी प्राप्त हो गये थे