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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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कपाल के धारण करने वाले हैं और उसकी पत्नी भी उनके ही संग होने
के कारण से विशेष गर्विता हो गयी हैं । अतएव शम्भु और सती भी
मेरे यज्ञ में शामिल नहीं होंगे । यही न बुलाने का हेतु मैंने पहले ही
अपनी पत्नी वीरणी को उस मन्दिर में बोलते हुए दक्ष के मुख से ही
सुना था । यही मेरे वचन का श्रवण करके वह सती कान्तिहीन मुख
वाली होकर भूमि में बैठ गई थी । वह कोप परायण होती हुई मुझसे
भी कुछ नहीं बोली थी ।
हे हर! उसी क्षण उसका मुख क्रोध से युक्त हो गया था और
उसकी भृकुटियाँ टेढ़ी हो गई थी तथा उसका मुख ऐसा श्याम पड़ गया
था जैसा कि धूमकेतु से आकाश हो जाया करता है । उसने थोड़ी ही
देर तक ध्यान करके उसने महान् स्फोट से अपने मस्तक का भेदन कर
अपने प्रिय प्राणों का उत्सर्जन कर दिया अर्थात् मृत हो गई थी
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-वृषभध्वज ने विजया के इस वचन का श्रवण
करके वे अत्यधिक कोप से प्रज्ज्वलित अग्नि की ही भाँति उत्थित हो
गये थे । अत्यधिक कोप से आकुल उनके कान्त, चक्षु, नासिका और
मुख से अग्नि की महती ध्वनि का सृजन करती हुई परमघोर जलती हुई
कणिकायें निकली थीं । कल्प के अन्त में आदित्य के वर्चस वाली
बहुत सी उल्कायें विनिःसृत हो गई थी । इसके अनन्तर वे शम्भु वह
पर बहुत ही शीघ्र चले गए थे जहाँ पर महान् तपस्वी दक्ष विद्यमान थे
और यज्ञ कर रहे थे । महान् कोप से आवृत्त होकर भर्ग ने उस यज्ञ क
अवलोकन किया था जो महान् धन के वैभव से सुसम्पन्न थे और पाः
धूप आदि युक्त था । वह यज्ञ हवन किया हुए आज्य से वृद्धि युक्त
था तथा दीप्त हुई वह्नि से विराजित हो रहा था । शम्भु ने समुचि
स्थानों पर संस्थित आयुधों और ध्वजों से युक्त सब दिक्पालों क
देखा था ।
उस यज्ञ के मध्य में विधाता की ओर व्यवस्थित भगवान् विष्णु क
भी अवलोकन किया था । उन सबको देखकर अतीव कोप से शम्
कुपित हो गये थे । अपनी-अपनी भार्याओं के सहित भग, सूर्य, सोम