कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextचिन्तन किया था। परमपुरुष का चिन्तन करते हुए उनका शरीर बहुत
अधिक कान्तियुक्त होकर चमक रहा था। तेज से उज्ज्वल उनको
देखने के लिए उस समय में मुनिगण भी समर्थ नहीं हुए थे। उसी क्षण
में जब ये शम्भु ध्यान से मुक्त हो गये तो भगवान् विष्णु की माया ने
भी उनका परित्याग कर दिया था उस समय वे तप के तेज से अतीव
उज्ज्वल एवं कान्तिमान् होकर चमक रहे थे।
जो-जो भी गण उस अवसर पर सेवा करने के लिए शंकर के
समीप में स्थित रहते थे वे सब भी उन शंकर अथवा दिवाकर के देखने
में समर्थ नहीं थे अर्थात् उन्हें देख नहीं सकते थे। उस काल में स्वयं
ही भगवान् विष्णु समाधि में मन लगाने वाले शिव के शरीर के अन्दर
ज्योति के स्वरूप से प्रविष्ट हुए थे। उन शंकर ने जठर में प्रवेश करके
जैसे पहले सृष्टि का क्रम था ठीक उसी भाँति स्वयं अव्यय नारायण
ने दिखा दिया था। वह न तो स्थूल है और न सूक्ष्म ही हैं, न विशेषण
के गोचर हैं, वह नित्य आनन्दरूप हैं, निरानन्दन हैं, एक हैं, शुद्ध हैं
और इन्द्रियों की पहुँच के बाहर हैं वह अस्पृश्य हैं और सब का दृष्टा
अर्थात् देखने वाला है, वह निर्गुण है, परमपद हैं, परमात्मा में गमन
करने वाला आनन्द हैं और जगत् के कारण का भी कारण हैं। सबसे
प्रथम शम्भु ने तत्स्वरूपी आत्मा को देखा था। वह पर प्रविष्ट हुए मन
में बाहर के ज्ञान से विवर्जित उसी के रूप प्रकृति को जो सृष्टि की
रचना के लिए भिन्नता को प्राप्त हुई थी। उसी के समीप एक उसको
पृथक् भूत हुई की भांति देखा था।
फिर इनमें जिस रीति से वास कर रहे पुरुषों को देखा था। हे
द्विजसत्तमोँ! जैसे स्थूल अग्नि के कण से निरन्तर होवें। वह ही काल
के रूप से बारम्बार भासित होता है। सृष्टि, पालन और अहंकार के
योगों का अवच्छेद से कारण है। प्रकृति और पुरुष ही काल भी जो
अभिन्न थे और सर्ग के लिए भिन्नता को प्राप्त हुए भी समान थे। इन
सबको पृथक भूत और अभिन्न चन्द्रशेखर प्रभु ने देखा था। एक ही
ब्रह्म है जो द्वैत से रहित और यहाँ पर कुछ भी नानारूप वाला नहीं है।