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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 67 of 442

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६८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
काम में अपनी ज्ञान की शक्ति को महेश्वर में ही स्थिति अर्थात् पालन
का करने वाला विष्णु हो गया था। सर्वशक्तियों के नियोग से मेरा
सदा ही तद्रूपता है।
वही परमेश्वर संहार करने वाले शम्भु हो गये थे। इनका वे फिर
तीनों शरीरों में अर्थात्-ब्रह्मा, विष्णु, शिव इन तीनों में वह स्वयं ही
प्रकाश किया करते हैं। ज्ञानरूप परमात्मा भगवान् प्रभु अनादि हैं।
सृजन, पालन और संहार के करने से एक ही हैं। वही ब्रह्मा, विष्णु
और महेश पृथक्-पृथक् नहीं हैं। इस प्रकार से शरीर, रूप और ज्ञान
हमारा अन्तर होता है। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस प्रकार से शिव
भगवान् ने उन अमित तेज वाले भगवान् विष्णु के वचन का श्रवण
करके अतिरेक से विकसित मुख वाले होकर पुनः जनार्दन प्रभु से
बोले-यदि ज्योति स्वरूप वाला और निरञ्जन महेश ही है, कौन सी
माया है अथवा कौन काल है अथवा कौन प्रकृति कही जाया करती
है? कौन से पुरुष उनसे भिन्न-अभिन्न हैं यदि ऐसा है तो फिर एकता
किस रीति से होती हैं? हे गोविन्द! उनके प्रभाव को मुझे बतलाइए।
श्री भगवान् ने कहा-आप ही सदा ध्यान में समवस्थित होकर
परमेश्वर को देखा करते हैं जो आत्मा में आत्मस्वरूप हैं और वह
ज्योति के रूप वाला सहक्षर है। हे विभो! माया को, प्रकृति को, काल
को और पुरुष को आप स्वयं जानने वाले हैं जब आप ध्यान का भोग
करते हैं तो उसी के द्वारा ज्ञाता हैं। इसीलिए आप ध्यान में तत्पर हो
जाइए क्योंकि इस समय में आप हमारी माया से मोहित हो रहे हैं। इसी
कारण से आप निश्चय ही परम ज्योति का विस्मरण करके वनिता में
निरत हो रहे हैं। अब आप कोप से युक्त हैं अतएव कोप को भूलकर
हे प्रथमों के स्वामिन्! प्रकृति के आदिरूप जिसको आप पूछ रहे हैं।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-फिर तो वहाँ पर महादेवजी ने इस परम
सुनिश्चित वाक्य का श्रवण करके समस्त मुनियों के देखते हुए ये योग
से युक्त होकर ध्यान में परायण हो गये थे। इस समय में बन्ध का
आसाद न करके विर्निमीलित लोचनों वाले महेश्वर ने सब आत्मा का