कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context६६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
कहा-यह जब भुवन वर्जिततमोमय अर्थात् तम से परिपूर्ण था। यह
अप्रज्ञात, अलक्ष्य और सभी ओर से प्रसुप्त के ही तुल्य था। यहाँ पर
दिन रात्रि का भाग नहीं है, न आकाश है और न काश्यपी ही है, न
ज्योति है, न जल है और न वायु है अन्य किञ्चित् संस्थित नहीं है।
परमब्रह्म एक ही था जो सूक्ष्म, नित्य और इन्द्रियों की पहुँच से परे हैं,
यह अव्यक्त और ज्ञानरूप से द्वैत से ही परिपूर्ण है।
प्रकृति और पुरुष ये दोनों सर्व सहित नित्य हैं। हे भूतेश! काल
भी स्थित है जो एक ही जगत् का कारण है। हे हर! जो एक परमब्रह्म
है वह स्वरूप से परे है उसी जगत के पति के यह तीनों रूप नित्य हैं।
काल नाम वाला दूसरा रूप है जो अनाद्य है और वह तो कारण है वह
सब भूतों का अवच्छेद से संगत होता है। फिर वह अपने प्रकाश से
भास्वरूप वाला प्रकाशित होता है। पहले सृष्टि की रचना करने के
लिए अतुल रूप से स्वयं प्रकृति से क्षोभयुत करता हुआ था। प्रकृति
के संक्षुब्ध हो जाने पर महत्तत्व की उत्पत्ति हुई थी। पीछे महत्तत्व से
तीन प्रकार का अहंकार समुत्पन्न हुआ था। अहंकार के समुत्पन्न होने
पर शब्द तन्मात्रा से विष्णु ने आकाश का सृजन किया था जो आकाश
अनन्त है और मूर्ति से रहित है अर्थात् आकाश की कोई भी मूर्ति नहीं
है। इसके उपरान्त महेश्वर ने रस तन्मात्र से जल का सृजन किया था।
उस समय वह अपनी माया से निराधार ने स्वयं ही धारण किया था।
इसके अनन्तर प्रभु ने तीनों गुणों की अर्थात् सत्व, रज, तम इनकी
समता ने संस्थित प्रकृति को परमेश्वर ने पुनः सृष्टि की रचना के लिए
संक्षोप्ति किया था। इसके पश्चात् उस प्रकृति ने उस जल में त्रिगुण
के भाग वाले निराकुल जगत् के बीच स्वरूप बीज को भली-भाँति
सृजन किया था। वही निश्चत रूप से क्रम से ही वृद्ध महान् सुवर्ण
का अण्ड हुआ था। उस अण्ड ने गर्भ में ही उस सम्पूर्ण जल को ग्रहण
कर लिया था और अण्ड के गर्भ में जल के स्थित हो जाने पर भगवान्
विष्णु ने उस अण्ड को आपकी ही माया से इस अतुल ब्रह्माण्ड को
धारण कर लिया था। जल, अग्नि, वायु तथा नभ से वह अण्डक