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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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६०८ श्रीकालिका पुराण ६०८ ६५
ब्रह्मा, विष्णु और शम्भु को एकत्रित हुए हृद्गत करो। जिस तरह एक
ही धर्मी के शिर, ग्रीवा आदि के भेद से अंग होते हैं। हे हर! ठीक उसी
भाँति मेरे एक के ही ये तीनों भाग हैं। जो ज्योति सबसे उत्तम है, जो
अपने और पराये प्रकाश रूप हैं, कूटस्थ, अव्यक्त और अनन्त रूप
से युक्त हैं और नित्य हैं तथा दीर्घ आदि विशेषणों से हीन तथा वह
पर है उसी रीति से हम तीनों अभिन्न हैं।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-उन भगवान् के इस वचन को श्रवण
करके महादेव विमोहित हो गये थे। वह अभिन्नता का ज्ञान रखते हुए
भी अन्य चिन्तन से सदा ही विस्मृति होने से ही उनको अभिन्नता का
ज्ञान नहीं हो रहा था। उन्होंने फिर भी गोविन्द से त्रिभेदियों की
अभिन्नता को पूछा था। ब्रह्मा, विष्णु और त्र्यम्बकों का और एक का
विशेषक को पूछा। इसके अनन्तर पूछे गए नारायण ने शम्भु से कहा
था और तीनों देवों का अनन्यता और एकता को प्रदर्शित किया था।
इसके उपरान्त विष्णु भगवान् के मुख कमल से कोश से अनन्यता का
श्रवण करके तथा विष्णु-विधि और ईश के तत्व में स्वरूप को
देखकर मृड (शिव) ने पुष्प, मधु से प्रकाश विधाता इसको नहीं
मारा था।
तीनों देवों का अनन्यत्व
ऋषिगणों ने कहा-भगवान् जनार्दन ने तीनों देवों की जो अनन्यता
को कहा था। हे द्विजोत्तम! शम्भु के लिए सदा अद्वय के श्रवण करने
की इच्छा रखते हैं अथवा गरुड़ध्वज ने कैसे एकत्व को दिखाया था ?
हे विप्रेन्द्र! उसको बतलाइए। हमको बहुत ही अधिक कौतूहल है।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-हे मुनिगणों! आप लोग श्रवण करिए। यह
तीनों देवों की अनन्यता अर्थात् उनके एकत्व का दर्शन परम गोपनीय
है। भगवान् हर ने भगवान् गोविन्द से पूछा था और बहुत ही आदर
के साथ सम्भाषण करके ही पूछा था। हे मुनिश्रेष्ठों! इन्होंने इनकी
अभिन्नता का प्रतिपादन करने वाला यहीं कहा था। श्री भगवान् ने