कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३८९
संस्कार किया हुआ है वह चूड़ाकर्म संस्कार निजगोत्र से संस्थित होंवे
वे दत्तक आदि पुत्र होते हैं अन्यथा दास कहा जाया करता है । हे नृप!
पाँचवे वर्ष से ऊपर दत्तक आदि पुत्रों को ग्रहण करके प्रथम पाँच
वर्षीय पुत्रेष्टि का समाचरण करना चाहिए । पौनर्भव पुत्र को जैसे ही
समुत्पन्न हो उसे समानीत करे ।
मनुष्य को चाहिए कि जातकर्म आदि समस्त संस्कारों को करे ।
पौनर्भवष्टोम के करने पर पौनर्भव कहा गया है । पिता का एकोद्दिष्ट
श्राद्ध नहीं करना चाहिए । जो मूल्य के द्वारा वनिता खरीदी गयी हैं वह
वनिता दासी कही जायी करती है, उसमें जो भी पुत्र समुत्पन्न होता है
वह पुत्र दास कहा गया है । वह राजा के राज्य का भागीदारी हुआ
करता है किन्तु विप्रों के श्राद्ध करने वाला नहीं होता है ।
राजा उसका नियोजन करके उससे तामिस्र नामक नरक में जाया
करता है । राजा को चाहिए कि वह काण्याव्यं अर्थात् विशेष अंग
वाला अथवा अंगहीन, पुत्र रहित, अनभिज्ञ, अजितेन्द्रिय, बहुत छोटे
कद वाला, रोगी को कभी अपना पुरोहित न बनावे । राजा को चाहिए
कि वह कभी कृपण के धन को ग्रहण न करे । द्विजों को बहुत अधिक
धन भी नहीं देवे । राजा कभी कामुक और उन्मत्त हाथी पर आरोहण
न करे । उस कामुक पर समारोहण करके इस लोक और परलोक में
विषाद को प्राप्त किया करता है । सम्पूर्ण धन के द्वारा राजा को अपनी
आयु की वृद्धि के लिए यत्न करना चाहिए । किसी भी क्रूर वार के
दिन अष्टमी और षष्टी तिथि में उत्तम नृप को अञ्जन, अभ्यञ्जन और
ताम्बूल का भी भोजन नहीं करना चाहिए ।
चन्द्रमा और सूर्य का ग्रहण अतीव सूक्ष्म होवे या पूर्ण हो तो राजा
को रक्तसूर्य का स्वयं अवलोकन नहीं करना चाहिए । जो उत्पात उत्पन्न
होता है चाहे वह दिव्य हो, भूमिगत हो या आकाशगत हो यत्नपूर्वक
उसे राजा को नहीं देखना चाहिए और यदि देख भी लेवे तो तीन दिन
भोजन नहीं करे । राजा सर्वदा मंगल रत्न को धारण करे और दूर्वा के
सहित ही पहने । राजा कभी भी वस्त्र से न ढके हुए शरीर को विप्रों