कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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चाहिए। दैवज्ञ (ज्योतिर्विद) कञ्चुकि, अमात्य, बन्दीजन, पुरवासीजन
से आवृत्त होते हुए तुमुल वाद्यों की ध्वनियाँ से तथा शुभ तौर्यत्रिकों के
साथ युक्त होकर शेष में पुनः शान्ति करके और आशीर्वाच्य करके
द्विजों को विधिपूर्वक सुवर्ण से युक्तपूर्ण दक्षिणा देवे तथा धान्य और
वस्त्र देकर उन सबको विदा करे।
इसके अनन्तर पुरोहित शेष जल से समस्त अमात्यादिक का सेचन
करे तथा तुरंग का, बल का, राष्ट्र का सेचन करना चाहिए। इस
प्रकार से करके पीछे राजा तीन रात्रि पर्यन्त पूर्णतया संयम से युक्त
होकर रहे। माँस का अशन, मैथुन से रहित रहे और मांगल्यों का सेवन
करे। यदि पुष्य नक्षत्र से युक्त तृतीया तिथि का लाभ है उसमें सदा
शंकर के साथ चण्डिका देवी का अर्चन करना चाहिए। पाञ्चायिकी
विहार आदि के द्वारा तथा शिशुओं के कौतुकों के, वैवाहिक विधि से
शिवा चण्डिका का मोहन करना चाहिए। समस्त चतुष्पथों (चौराहों)
में और देवों तथा देवियों के मन्दिरों में पताकाओं को लगाकर उन्हें
भूषित करे और ऐसा करता हुआ कभी भी दुःख नहीं पाया करता है।
इस रीति से शान्ति यज्ञ को सुसम्पन्न करके तथा पुष्य का अभिसेचन
करके चतुरंगों के साथ, भार्याओं और नरों के साथ राज्य मण्डल से
समन्वित यहाँ पर और परलोक में कभी भी दुखित नहीं हुआ करता
है और इससे बड़ा और श्रेष्ठ कोई भी न यज्ञ होता है और न इससे
उत्तम कोई उत्सव ही हुआ करता है।
इससे बढ़कर कोई भी शान्ति नहीं है और इससे अधिक कोई
कल्याण एवं मंगल नहीं होता है। इस विधान से ही नृप का अभिषेचन
होता है और राजपुरोहित को चाहिए कि इसी विधान से युवराज का
अभिषेक करे। यदि नृप को अभिषेक का समाचरण करना हो तो इसी
विधान से नृप सदा स्थिर होता है। प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने इन्द्रदेव
से यही यज्ञ कहा था। इसी भाँति राजा इस यज्ञ को करके यहाँ पर
और परलोक में कभी दुःख नहीं पाया करता है।