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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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Page 375

३७८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ

नवग्रहों का और मातृघटों में मातृकाओं का पूजन करना चाहिए ।
सभी देवों का घट में यजन करना चाहिए । उनके घट पृथक्-पृथक्
होते हैं । हे नृप ! पूर्व में नौ ही कहे गए हैं जो मुख्य तथा वर्णित हैं ।
भक्ष्य, भोजन, पेय अनेक भाँति के पुष्प और फल-पावक पायस जो
भी सम्भव योजित हों उनके द्वारा राजा सकल सुरों का पुष्प स्नान के
लिए पूजन करे । मंडल के दक्षिण में कुण्ड का निर्माण करके पायस,
समिधा, शाली सिद्धार्थ, दूर्वा, अक्षत तथा केवल घृत से पूजित सकल
सुरों को ऋत्विक् पुरोहित के सहित नृप वृद्धि के लिए होम के द्वारा
सन्तुष्ट करे । होम के अन्त में मण्डप के उत्तर में वेदिका में पदक के
सहित, रोचना नामक तथा अलंकारों को सबको नियोजित करे । वृद्धि
में अंगुलि से छब्बीस अंगुलिका की अवधि पर्यन्त वृत्त अथवा चौकोर
त्रिकोण संज्ञा वाले पद्म को । फिर पद्म के मध्य में मुगोष्टिक से
रत्नेशों को, श्रीवृक्ष, वरारोहा, शुभावन्त उमा देवी को सब रत्नों से और
अलंकारों से दो हाथ यह बनाना चाहिए । वह एक साथ विस्तार वाला
और नौ हाथ दश अंगुल वाला ऊँचा स्नान के लिए, डेढ़ हाथ का वृत्त
तथा गुणों से अवलम्बित करे । शय्या चौगुनी दीर्घ बनावे और धनुष
के मान वाला पीठ करे । गज और सिंह के द्वारा किए हुए आरोप
वाला और हेम तथा रत्नों से विभूषित सिंह नामक सार्ध विस्तार से
दण्डासन को अथवा व्याघ्र चित्रक पदों के द्वारा उपधानों को करावे ।
अथवा अन्यों के द्वारा निर्मित्त चर्म मृदुतूल से पूरित चार हाथ वाली
परिमाण में सुन्दर लक्षण से युक्त दीर्घ विस्तार से युक्त शय्या गुरु
विद्या से नृप की वितस्ति से अधिक की इच्छा करते हैं ।
केवल सोलह ही वर्ण और चित्र से युक्त करने चाहिए । यान,
सिंहासन, पट्टशय्या के उपकरण आदि राजा के योग्य हो वह वेदी के
उत्तर की ओर न्यस्त करे । उनके पश्चिम में सब प्रकार के रत्नों के
समुदाय से स्वतिक श्रेष्ठ पर्यंक पर जो यज्ञ के काष्ठ के समूह से
निर्मित महान् आस्तरण वाले, अर्धच्छादन से संयुत हो तथा चर्म से
आवृत चतुष्टय वाले, वृषभ के तथा सिंह शार्दूलों के ऊर्ण से आवृत्त