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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 370 of 442

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Page 370

௬०९ श्रीकालिका पुराण ௬०९ ३७३
[राज्याभिषेक वर्णन]
और्व ने कहा-हे राजन् अब मैं आपको पुण्य स्नान की विधि के
क्रम को बताऊँगा जिसके विधान से ही विघ्न निरन्तर नाश को प्राप्त
हो जाया करते हैं । पौष मास में चन्द्र के पुष्य नक्षत्रगत होने पर राजा
को पुण्य स्नान का समाचरण करना चाहिए । यह स्नान सौभाग्य और
कल्याण के करने वाला होता है और दुर्भिक्ष तथा मरण का अपहरण
करने वाला होता है । विष्टि ( भद्रा ) आदि दुष्ट करण में, व्यतीपात
और वैधृति में वज्र, शूल, हर्षण आदि योग में यदि इसका लाभ होता
है तो तृतीया से युक्त पुष्य नक्षत्र रवि, शौरि और मंगलवार में तब यह
समस्त दोषों की हानि करने वाला होता है । ग्रहदोष होते हैं और राज्यों
में ईतियाँ होती हैं । तब पुष्य नक्षत्र में मासान्तर में भी करना चाहिए ।
यह शान्ति पहले समय में ब्रह्माजी ने गुरु के लिए बताई थी और
जगत्पति ने शक्र आदि समस्त देवों की शान्ति के लिए ही कहा था ।
तुष, केश, अस्थि, वल्मीक, कीट देश आदि से वर्जित, शर्करा, कृमि,
कूष्माण्ड, बहु कृष्ट से रहित, काक, उलूक, कंक, ककोल, गृध्र,
शौनकी से रहित और जलोका आदि से वर्जित, चम्पक, अशोक,
वकुल आदि से विराजित अपने स्थान में हंस और कारण्वों से
समाकीर्ण अथवा शुचिसर के तट पर पुण्य स्नान के लिए राजा को
उत्तम स्नान का ग्रहण करना चाहिए । इसके अनन्तर राजा और पुरोहित
अनेक वाद्यों की ध्वनियों के साथ प्रदोष के समय में उस स्थान पर पूर्व
दिन में गमन करें । उस स्थान की कौबेरी दिशा में पुरोहित स्थित होकर
सुगन्धित चन्दन, पान कर्पूर आदि से अधिवासित गोरोचनाओं से
सिद्धार्थों से, अक्षतों से जो फल आदि के सहित हो, 'गन्ध द्वारा'
इत्यादि मन्त्रों के द्वारा सबके अधिसिक्तों से उस स्थान को अधिवासित
करके वहाँ पर देवगणों का पूजन करना चाहिए ।
भगवान् गणेश, केशव, इन्द्रदेव, ब्रह्मा, देव शंकर उमा के सहित
और समस्त गण देवता और मातृगणों का पुरोहित के साथ राजा अर्चन
करे । मंगल कलशों को स्थापित करे और अनेक प्रकार के नैवेद्यों के