कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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हे, वह देवी कौन सी है और वहाँ किस स्थान में स्थित रहा करती है ?
हे लोक पितामह ! यह सभी कुछ मैं आपके मुखकमल से श्रवण करने
की इच्छा करता हूँ। जो अपनी समाधि का त्याग करके एक क्षणमात्र
भी दृष्टिगोचर नहीं हुआ करते हैं उनके समक्ष हम भी स्थित नहीं हो
सकते हैं वह फिर उनको कैसे मोहित करेगा ? हे ब्रह्माजी! उनके नेत्र
जलती हुई अग्नि के प्रकाश के समान हैं तथा वे जटा-जूट के समुदाय
से विकराल स्वरूप वाले हैं। ऐसे त्रिशूलधारी शिव को देखकर उनके
सामने कौन सी क्षमता है जो कि स्थित हो सके । उस शम्भु का इस
प्रकार का स्वरूप है। उनको मोहित करने की इच्छा से मैंने भी स्वीकार
किया था। अब मैं उस देवी के विषय में तात्त्विक रूप से श्रवण करने
की इच्छा रखता हूँ।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-उसके उपरान्त ब्रह्माजी ने कामदेव के
वचन को सुनकर बोलने की इच्छा वाला होकर भी अनुत्साह के
कारणस्वरूप उसके वाक्य को श्रवण कर भगवान् शंकर के मोहन
करने में चिन्ता से समाविष्ट होते हुए कि मैं शंकर को मोहित करने में
समर्थ नहीं हूँ, इस रीति से उन ब्रह्माजी ने बार-बार निःश्वास लिया था
अर्थात् चिन्ता से श्वास छोड़ा था। उनकी निःश्वास की वायु से अनेक
रूपों वाले महाबलवान् चंचल जिह्वा वाले अति भयंकर और अत्यन्त
चंचल गण समुत्पन्न हो गए थे। उन गणों में कुछ तो घोड़े के समान
मुख वाले थे तथा कुछ हाथी के मुख जैसे मुखों वाले थे। अन्य सिंह
तथा बाघ के मुख के समान मुखों वाले थे। कुछ गण रीछ और मार्जार
के जैसे मुखों से संयुत थे तो कोई-कोई शरभ तथा शुक के मुखों वाले
थे। कुछ प्लव और गौ मुख के सदृश मुख वाले थे तथा कोई सरीसृप
के मुख के समान मुखों से समन्वित थे, कुछ उन गणों में गौर रूप थे
तो कुछ गाय के समान मुखों से संयुत थे। कोई-कोई पक्षी के सदृश
मुखों से संयुत थे। कुछ बहुत विशाल तो कुछ बहुत ही छोटी शरीर
वाले थे। कोई-कोई महान् स्थूल थे तो कुछ बहुत ही कृश थे। उन
गणों के अनेकानेक स्वरूप बताये जा रहे हैं-कुछ पीली आँख वाले,