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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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श्रीकालिका पुराण २८३
और भैरव उनसे पूछेंगे। अब मैं तपश्चर्या करने के लिए जाना चाहता
हूँ। यह समय ऐसे बिताना युक्त नहीं हैं। इससे हे वीर श्रेष्ठों! मुझको
आप छोड़ दीजिए।
इतना कहकर वह मुनिश्रेष्ठ कपोत वन में चला गया था। उन दोनों
ने उस मुनि को प्रणाम किया था और फिर वह दोनों अपने भवन को
चले गए थे। इसके अनन्तर उस समय में वे दोनों समय करके
तपश्चर्या के लिए दीक्षित हुए थे। माता-पिता से अनुज्ञा प्राप्त करके
भाइयों को और अन्य बान्धवों को भी ज्ञापित करके उन दोनों महामति
वालों ने कामरूप के लिए प्रस्थान किया। उमा देवी के सहित भगवान्
शंकर भी उन दोनों का गमन जानकर इन्द्र के सहित समस्त देवों को
सान्त्वना देते हुए यह बोले। ईश्वर ने कहा-हे सुरेश्वरो! मेरे दोनों पुत्र
तप करने के लिए गए हैं। वे दोनों मेरी आराधना में चित्त वाले हैं।
वे सुर श्रेष्ठो! उन पर दया करो। इन दोनों पुत्रों का जो कि वेताल और
भैरव नाम वाले हैं, तपस्या से संस्कार करके मैं इनको गाणपत्य में
नियोजित करूँगा। हे निर्जरो! आप लोग उन दोनों का संस्कार कर दो।
तप से उन दोनों के शरीर मानुषभाव त्याग कर जिस रीति से दोनों
सारभाव को प्राप्त हो जावें, मैं वैसा ही करूँगा। इतना कहकर वामदेव
भी पार्वती के साथ ही आकाश मार्ग से गमन करते हुए पुत्रों के पीछे
स्नेह से गए थे। अपने पुत्रों के पीछे अनुगमन करते हुए भगवान् हर के
पीछे-पीछे गमन करने लग गए थे। इसके अनन्तर उन दोनों ने जो इस
समय कृष्ण हिरण कें चर्म का धारण करने वाले थे, उनको आगे एक
नदी मिली थी। वे दोनों ही तापस के भाव को प्राप्त हुए थे। वह नदी
हषद्वती थी जो कि गंगा के ही समान परम पावन थी। भगवान् त्र्यम्बक
देव के द्वारा वे दोनों कामरूप नाम वाले आश्रम में समापतित हुए थे।
कामरूप पहुँचकर करतोया नदी का जल मिला था। हे नृपोत्तम! उन
दोनों ने नदी के जल में आचमन किया। फिर नन्दिकुण्ड पर पहुँचे थे।
वहाँ आचमन तथा स्नपन करके फिर जठाद्भवा नदी पर गमन किया
था। वहाँ पर दोनों ने उपस्पर्शन किया था और वहाँ पर तप के द्वारा