कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context२८२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
वासिनी हैं वहाँ पर करतोया नदी है। वह तीस योजन विस्तार वाली
हैं और एक शतयोजन आयत है। वह त्रिकोण कृष्ण वर्ण से युक्त तथा
बहुत से पर्वतों पूरित हैं। सौ नदियों से समायुक्त है और नाम कामरूप
कीर्तित किया गया है।
भगवान् शम्भु के नेत्र से भस्मीभूत हुए कामदेव ने भगवान् शम्भु
के अनुग्रह से वहाँ पर रूप को प्राप्त किया था इसीलिए तभी से वह
कामरूप हो गया था। उसी पीठ के मध्य भाग से वायव्य में, नैर्ऋत्य
में, ऐशानी में और आग्नेयी में, मध्य में और पार्श्व में शंकर है। इन
छःस्थानों में परम शोभन अपना आश्रम स्थान बना कर वहाँ पर भी
पार्वती के साथ सब कार्यों को करते हुए नित्य ही शंकर निवास किया
करते हैं। मध्य में देवी का गृह है। वहाँ पर उसी के अधीन शंकर हैं।
वहाँ पर नील नामक श्रेष्ठ पर्वत में पार्वती विराजमान रहती हैं। ऐशानी
दिशा में त्राटक शैल पर भगवान् शंकर का महान् आश्रम है। वहाँ पर
नित्य ही ईश्वर निवास किया करते हैं और उनके अधीन पार्वती रहती
हैं। और दूसरे हर तथा गौरी के सनातन आश्रम हैं किन्तु इन दोनों के
सदृश कोई भी शंकर का आश्रम नहीं है। हे नर श्रेष्ठो! जहाँ पर आप
दोनों के द्वारा महादेव आराधना करने के योग्य हैं उसी स्थान को मन
से ग्रहण करके वृषभध्वज को प्रसन्न करिए।
- वेताल और भैरव ने कहा-हे मुनिवर! हम कापरूप को गमन
करेंगे जो रहस्य पूर्ण नाटक पर्वत है। जहाँ पर गौरी हैं। जहाँ पर नित्य
ही सन्निहित हुए संस्थित रहा करते हैं। हम दोनों को वहाँ पर अवश्य
ही भगवान् भूतेश्वर की आराधना करनी चाहिए। हे द्विजोत्तम! जहाँ पर
आराधना करेंगे उसी भाँति आप बताइए। ऋषि ने कहा-हे नर श्रेष्ठों!
पर्वतों में श्रेष्ठ नाटक पर्वत पर आप जाइए। वहाँ पर नित्य ही
महादेवजी अपर्णा के साथ रमण किया करते हैं। वहाँ पर सन्ध्याचल
पर ब्रह्माजी के पुत्र वसिष्ठ मुनि भगवान् शंकर की आराधना किया
करते हैं आप दोनों ही वहाँ पर चल जाइए और वे ही हर के आराधना
के क्रम में तन्त्र के सहित मन्त्र ज्ञापित कर देंगे जबकि आप दोनों वेताल