कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
Page 254 of 442
Read in context२५६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
होकर नेत्र से क्रोध की उत्पत्ति की थी। क्रोध से निकलने वाली
जातवेदा के स्वरूप वाली का ज्ञान प्राप्त करके कामदेव पुरुषों के भाग
को निष्क्रमण करके कामदेव के वाणों को जान कर शक्ति से प्राणों
को तथा आत्मा का आकर्षण करके विधाता ने पालन किया था और
उन पितामह ने उस समय में बसन्त को उत्साहित किया था।
उस समय अपनी शक्ति के द्वारा कामदेव को शम्भु के क्रोध से
रक्षित करते हुए महेश्वर को क्रोधित देखकर देवगण जो आकाश में
स्थित थे उन्होंने प्रार्थना की थी कि हे जगतों के नाथ! प्रसन्न होइए और
कामदेव पर क्रोध का त्याग कर दीजिए। जिस प्रकार से पहले आपने
शम्भुरूप में कर्म के द्वारा सृजन किया था और जिसने कर्म को
आयोजित किया था उसी को कामदेव कर रहा है। इस कारण से हे
शम्भो! कामदेव पर जो आपकी क्रोधाग्नि है उसका उपसंहार करिए।
हे समस्त भूतों के स्वामिन्! आप प्रसन्न हो जाइए! हम लोग बड़ी
ही भक्ति के भाव से आपके चरणों में प्रणत हुए हैं। इस भाँति वे
देवगण कह रहे थे कि उनके कहते हुए हुओं के सामने ही शम्भु के
ललाट की चक्षु से समुद्भूत अनल ने कामदेव को भस्म कर दिया था।
ज्वालाओं की मालाओं से अत्यन्त दीप्त उस वह्नि ने कामदेव को दग्ध
कर दिया था और वह फिर हर के समीप नहीं जा सका था। कामदेव
ने भी कामदेव के शरीर से समुत्पन्न उस भस्म को लेकर अपने समस्त
अंगों में उसी समय में भस्मे का लेप कर लिया था। जो लेपन करने
से बची हुई भस्म थी उसका हर ने आदान कर लिया था।
विधाता के द्वारा सम्मत होने पर शम्भु काली को त्याग कर गणों
के सहित अन्तर्धान हो गये थे और ब्रह्माजी ने समस्त देवों को दहन
करने वाली शम्भु की क्रोध की अग्नि को बड़वा कर रूप वाली देवों
के आगे ही उस समय में कर लिया था। उस अवसर पर सौम्य, शुभ
ज्वालामुखी बड़वा को देखकर पूर्व पीड़ित देवगण निर्विघ्न मन वाले
हो गये थे। उसी समय विधाता उस ज्वालामुखी बड़वा को ग्रहण करके
जगतों के स्वामी के लोकों के हित के लिए सागर में चले गये।