कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context२४० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
ने कहा-आपके एक सौ पुत्र होंगे जो बल वीर्य से समन्वित होंगे। उनमें
मुख्य एक बलवान् सबसे प्रथम होगा। और आपकी पुत्री देवों, मनुष्यों
और राक्षसों के हित के लिए तथा सम्पूर्ण जगतों की भलाई के लिए
मैं होऊँगी। आप सुखपूर्वक प्रसव करने वाली तथा नित्य ही पतिव्रता,
अम्लान रूप से सम्पन्न और सुभगा होंगी।
इस रीति से इतना कहकर जगत् की धात्री वहीं पर अन्तर्धान हो
गई थी। मेनका परम प्रसन्नता की प्राप्ति करके अपने स्थान में प्रवेश
कर गई थी। इसके उपरान्त काल के सम्प्राप्त होने पर मेनका ने अचलों
में अत्युत्तम मैनाक पर्वत को प्रसूत किया था। जो आज तक पंखों के
सहित सागर के मध्य निवास किया करता है। ये सभी पुत्र महान् वीर्य
वाले महान् सत्त्व से समन्वित और सभी गणों से सुसम्पन्न थे। इसके
उपरान्त वह जगन्मयी योगनिद्रा कालिका देवी जिसने पूर्व में सती के
रूप का त्याग कर दिया था जन्म ग्रहण करने के लिए मेनका के समीप
में गयी थीं। भय के अनुसार मेनका के उदर से शिवा ने समुद्भूत
होकर सागर से लक्ष्मी की ही भाँति समुत्पत्ति ग्रहण की थी। बसन्त के
समझ नक्षत्र के योग से नवमी तिथि में देवी आधी रात्रि में राशि के
मण्डल से गंगा के ही समान समुत्पन्न हुई। उसके समुत्पन्न होने पर सभी
दिशाएं प्रसन्न हो गयीं थी।
उस अवसर पर परम शुभ सुगन्धित और गम्भीर वायु बहने लगी।
उस समय पुष्पों की वर्षा हुई थी और जल की वृष्टि भी हुई। जो
अग्नियां शान्त थीं वे प्रज्वलित हो गई थीं और घन गम्भीर गर्जन करने
लगे थे। उस देवी के समुत्पन्न होने मात्र से सबने स्वास्थ्य की प्राप्ति की
थी। नील कमलों के दलों के समान समुत्पन्न हो श्यामा थी, देवी मेनका
अतीव हर्षित होकर परम आनन्द को प्राप्त हुई थी और देवों ने भी उस
समय बारम्बार अतुल हर्ष की प्राप्ति की। गन्धर्व और अप्सराओं के
समुदाय आकाश में स्थिर होकर स्तवन कर रहे थे। हिमवान् की सुता
को 'काली' नाम से बुलाया था तथा काली नाम से गिरिनन्दनी
कीर्त्तिका की गई थी। इसके उपरान्त वह वर्षा के समय गंगा तथा
शरत्काल में चाँदनी के समान बड़ी होने लगी।