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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 228 of 442

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Page 228

२३० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
उस समय जो भूमि के भार स्वरूप थे ऐसे अनेक दैत्यों को निहत
कर दिया। फिर परम प्रसन्न होकर क्रीड़ा करते हुए उन्होंने द्वारका में
निवास किया था। इसके अनन्तर उत्पीड़ित होकर वहाँ पर आये और
द्वारका में भगवान् के दर्शन के लिए ही उपस्थित हुए। वहाँ लोकों के
द्वारा वन्दित प्रभु कृष्ण का स्मरण करके उनके द्वारा पूजित होते हुए
वह सुवर्ण के आसन पर विराजमान हो गये। इन्द्रदेव ने भगवान् हरि
के लिए नरक का जो विकेष्टि था वह सब कह दिया था। जो पूर्व
में हुआ था और उस समय में हो रहा है वह सभी इन्द्र ने निवेदन कर
दिया था। हे महाबाहू! हे श्रीकृष्ण! जिस प्रयोजन के लिए मैं यहाँ
आया हूँ उसका आप श्रवण कीजिए। मैं वह सभी कुछ निवेदन
करूँगा। उसमें आप कुछ भी शंका न करिये।
एक भूमि का पुत्र नरक नाम वाला असुर है जो सुरों का मर्दन
करने वाला है। वह चिरंजीवी है और पहले भगवान् विष्णु और क्षिति
के द्वारा पालित हुआ है। इस समय में क्षिति और भगवान् विष्णु की
अवज्ञा करके वाण के वचन से उसने तप के द्वारा ब्रह्माजी को परितुष्ट
कर लिया है। ब्रह्माजी से वरदानों को प्राप्त करके वह अत्यन्त घमण्डी
हो गया है। वह इस समय ऐसा दर्पित हो गया है कि न तो उसने माधव
का और न पृथ्वी का कभी स्मरण किया है। पूर्व में वह धर्मात्मा था,
सुरों की अराधना की थी और वह व्रतधारी था किन्तु इस समय वह
असुर भाव का आश्रय लेकर सबको बाधा दिया करता है। अदिति के
अमृत से समुद्भूत दोनों कुण्डलों को मोह से उसने हरण कर लिया
और देवगणों और ऋषियों को बाधा देता हुआ विप्रों के अप्रिय कर्म
में वह रत रहता है। कामगामी, दुरासद वह मुझको भी नित्य बाधा देता
है। वह सुरों और दैत्यों का जीतने वाला है तथा कोई भी देहधारी
उसका वध करने में समर्थ नहीं है। आपका भी वह अन्तर पेक्षी है, उस
पापी का भूमि की रक्षा के लिए वध कीजिए। सब देवगणों ने आपके
लिए देवों और गन्धर्वों की कन्यायें पहले मुख्य पर्वत पर हिमालय में
अवतारित की थीं। ये सोलह सहस्र हैं। वरदान के घमण्ड से भरे हुए