कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २०७
हरे! आप पर हैं। आप पर और अपर स्वरूप वाले तथा जो पार जाने
वाले हैं उनको पार पहुँचाने के कारणरूप हैं। अपनी आत्मा से ही
आत्मा को धारण करके हे हरे! आप धरा का रूप धारण करनेवाले
हैं। हे त्रिविक्रमू! आप आधार स्वरूप वाले हैं और आप समस्त लोकों
का भरण किया करते हैं। हे सुरेश्वर! आप समस्त वेदों से परिपूर्ण एवं
श्रेष्ठ हैं। धाम के कारण के भी आप कारण हैं। आप देवों के समुदाय
के परम ईशान हैं और नारायण हैं। आपका कोई भी जन्मदाता नहीं
है और आप इस जगत की योनि अर्थात् उत्पादक हैं। आप पादरहित
हैं तो सदा गति वाले हैं। आप तेज और स्पर्श से रहित हैं। हे ईश्वर!
आप सभी के स्वामी हैं। आपका कोई भी आदिकाल नहीं है और आप
ही सबके आदि हैं। आप नित्य अनन्तर हैं जो हेम का अण्ड है और
इन सब जगतों का बीज हैं और ब्रह्माण्ड की संज्ञा से युक्त है। उस
ब्राह्मण्ड के बीज आपका ही तेज होता है। आप ही सबके आधार रूप
हैं और आप स्वयं बिना आधार वाले हैं। आप स्वयं तो बिना हेतु वाले
हैं किन्तु सबके कारण स्वरूप हैं।
हे विश्व के स्वामिन्! हे प्रभो! आप ही समस्त लोकों के प्रभाव
अर्थात् जन्म स्थान हैं अथवा जन्म देने वाले हैं। आप सृष्टि, स्थिति
और संहार के हेतु हैं। आप विधाता, विष्णु और आत्मा के धारण
करने वाले हैं। आपकी सेवा में बारम्बार नमस्कार है। आपकी मूर्ति
दस प्रकार की है और वह मूर्ति ऊर्मि षट्क आदि से रहित है। आप
ज्योति के स्वामी हैं आप ही अम्भोधि अर्थात् सागर हैं उन आपके किए
बारम्बार प्रणाम समर्पित हैं। हे परेश! कौन हैं जो आपके भाव का
वर्णन करने में समर्थ हो अर्थात् ऐसा कोई भी नहीं है। जो आप स्थूल
से भी स्थूल हैं, अर्थ वर्ग से भी अणु रूप वाले हैं। जो नभ से परे
आदित्य के वर्ण वाले थे आज उनके ही मिले मेरा नमस्कार है। जो
पुरुष सहस्त्र शीर्षों वाले हैं तथा सहस्त्र चरणों वाले हैं, सहस्त्र चक्षुओं
से युक्त हैं और इस पृथ्वी के सभी ओर हैं, जो दश अंगुल के समान
परिमाण वाले स्थित थे वही उग्र भगवान् विष्णु यहाँ मेरे ऊपर प्रसन्न