कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
Page 199 of 442
Read in context൘൘ श्रीकालिका पुराण ൘൘ २०१
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
है। इस कारण से आप कृपा करके ऐसा स्थान प्रदाए करिए जो तीनों
लोकों में महान दुर्लभ होवे। मैं समस्त प्राणियों में होकर प्रत्यक्षदर्शी हूँ।
मैं ज्ञानरूपी दीपिका का निर्माण करके इस जगत जात का अर्थात् पूरे
जगत् का उद्धार करूँगा। इस समय अज्ञानरूपी सागर में मग्न इस
सम्पूर्ण जगत को ज्ञानरूपी प्लव अर्थात् सन्तरण का साधन प्रदान
करके मैं तीनों का तारण करूँगा। हे प्रभो! आप हमारे नाथ हैं। पूजा
के योग्य हैं और जगत के पालक हैं। महात्मा कपिल के द्वारा इस रीति
से कहे गए उन मनु ने फिर उन संशित व्रतों वाले महात्मा कपिल को
उत्तर दिया।
मनु ने कहा-यदि आप समस्त जगत का भला करने के लिए ज्ञान
दीपिका के करने की इच्छा वाले हैं तो फिर आपको इस स्थान की
प्रार्थना से क्या करना है? आपने पहले हिरण्यगर्भ के महान अद्भुत
तप का तपन किया था जो बहुत ही अद्भुत स्वरूप वाला था। हे
द्विज! उसने मुझसे किसी भी स्थान के लिए याचना नहीं की थी कि
जहाँ पर तपश्चर्या की जावेगी। भगवान शम्भु तो सम्भोग के सर्वथा
शून्य हैं उन्होंने देवों के भाव से वर्षों तक अर्थात् दस हजार वर्षों तक
तपश्चर्या की थी किन्तु उन्होंने भी स्थान की कभी इच्छा नहीं की थी।
देवेन्द्र, नीतिहोत्र, शमक, राक्षसों का स्वामी, यादवों के पति, मातरिश्वा
तथा धनाध्यक्ष कुबेर इन सबने तीव्रतम तप किया था। जो दिक्पाल
के पद की इच्छा रखने वाले थे अर्थात् दिक्पाल के पद की प्राप्ति के
ही लिए इन सबने तपस्या की थी। हे महामुने! उन्होंने भी किसी भी
स्थान के अनुसन्धान करने की इच्छा नहीं की थी। हे कपिल! देवों के
आलय, तीर्थ, स्थल, क्षेत्र तथा पवित्र सरितायें बहुत से पुण्य परिपूर्ण
स्थान इस भूमि में स्थित हैं उनमें से आप किसी भी एक स्थान की प्राप्त
करके तपश्चर्या करते हैं। हे ब्रह्मन्! क्या वहाँ पर तपश्चर्या की सिद्धि
नहीं होगी! फिर मुझसे किसी भी स्थान की प्रार्थना करना केवल
आपका विकत्थन ही है। यह ऐसा विकत्थन करना तपस्वियों को धर्म
युक्त नहीं होता है।