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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 174 of 442

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Page 174

१७६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
जाकर कूर्म के ऊपर संस्थित हो गये थे और पृथ्वी को धारण कर
लिया था।
इसके अनन्तर ब्रह्माजी ने सभी प्रजापतियों को भली-भाँति उत्पादन
करके समस्त लोकों के पितामह ने इस जगत् को उत्पादित कर लिया
था अथवा ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं जबकि अन्य भी सृष्टि किया
करते हैं। जो परब्रह्म के रूप वाले हैं वे स्वयं निरन्तर अनुग्रह किया
करते हैं और प्रकृतियाँ व महाभूतों को अनुगृहीत किया करती हैं।
पुरुष तथा महदादिक भी अनुग्रह किया करते हैं जो ईश्वर की
इच्छा के अनुसार अष्ट संचय अधिष्ठान पुरुष से अनुगृहीत किया करते
हैं। पुरुषों के अधिष्ठान से और महाभूतों के गुण से उसी भाँति से
महदादि का और महात्मा काल के अधिष्ठान से तथा प्रधान के
अधिष्ठान से जो कुछ समुत्पन्न होता है। स्थावर अर्थात् अचर और
जंगम अर्थात् चेतन स्थिर अथवा अद्भुत हे द्विजश्रेष्ठों! सभी कुछ
अधिष्ठान से उत्पन्न होता है। जैसा कि पूर्व में दिखाया था वह सब
आपको बतला दिया था। जिस प्रकार से इस जगत् के प्रपंच की परा
असारता दिखलाई थी और जहाँ पर सार दिखलाया है। हे द्विजों! वह
आप मुझसे श्रवण करिये।
सारासार निरूपण
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-यह सम्पूर्ण जगत् सारहीन है, अनित्य है
और महान दुःखों का पात्र अर्थात् आधार है। यह एक ही क्षण में तो
उत्पन्न होता है और एक ही क्षण में विपन्नता को प्राप्त हो जाया करता
है। यह निस्सार जगत शीघ्र ही उस भाँति सार से उत्पन्न होता है और
फिर महाप्रलय के संगम में उसमें विलीन हो जाया करते हैं। भगवान
हरि ने उत्पत्ति और प्रलयों से जगत की निःसारता शम्भु के लिए भाव
से जगतों के पति ने दिखलाई थी। एक शिव, शान्त, अनन्त, अच्युत,
पर से भी पर, ज्ञान से परिपूर्ण, विशेष अद्वैत, अव्यक्त और अचिन्त्य
रूप ही सार है उससे अन्य सार नहीं है। जिससे यह उत्तम जगत् अर्थात्