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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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൘൘ श्रीकालिका पुराण ൘൘ १७३
हुई तरंगों वाले जलों के समूह से जो ध्रुव के स्थान पर्यन्त संगत थे और
घोर वृष्टि की थी। फिर वह जनार्दन प्रभु इन तीनों लोकों को अपने
उदर में रखकर वे परमेश्वर शेष के पर्यंक पर शयन किया करते हैं।
वे जगत् के गुरुदेव ब्रह्मा को अपनी नाभि के कमल में शयन किए हुए
संस्थापित करके इन तीनों लोकों को श्री के सहित दग्ध करके और
भक्षण करके नारायण के स्वरूपधारी ब्रह्मशरों की शय्या में शयन
किया करते हैं अर्थात् शेषशय्या पर सो जाते हैं। त्रैलोक्य के ग्रास से
गृहित वे प्रभु योगनिद्रा के वशीभूत हो गये हैं। जिस समय में कालाग्नि
ने सम्पूर्ण त्रिलोकी की दग्ध कर दिया था उसी विष्णु के समीप में
समागत हो गये थे। उनके द्वारा त्यागी हुई पृथ्वी एक ही क्षण में नीचे
की ओर चली गयी थी और वह कूर्म के पृष्ठ भाग पर पतित होकर
उस समय विकीर्ण सी हो गयी थी। कूर्म ने भी बड़े भारी प्रयत्नों से
जल में चलती हुई पृथ्वी को पैरों से ब्रह्माण्ड पर आक्रमण करके पृष्ठ
पर धरा को धारण किया था।
ब्रह्माण्ड के खण्डों से संयोग से वह पृथ्वी चूर्ण हो गयी थी इससे
भगवान् कूर्म रूपधारी जनार्दन ने उसको परिगृहीत कर लिया। चलते
हुए जल के समूह में संसर्ग से चलती हुई धरा से उस समय में कूर्म
पृष्ठ बहुतर वरण्डी से विततीभूत अर्थात् विस्तृत कर दी थी। अनन्त
भगवान उस समय में क्षीरोद सागर में गये थे वहाँ पर उन्होंने देखा कि
भगवान जनार्दन प्रभु अपनी श्री के साथ शयन कर रहे थे। मध्य में
रहने वाले फन से त्रैलोक्य के ग्रास से उपवृंहित हो धारण कर रहे थे।
महान बल वाले ने पहले फन को चौड़ा कर ऊर्ध्व में पद्म बनाकर उन
शेषनागधारी ने परमेश्वर भगवान विष्णु को समाच्छादित कर दिया
था। अनन्त ने अपने दाहिने फन को उनका उपधान (तकिया) बना
दिया था। महान् बलवान उन्होंने उत्तर फन को चरणों की ओर तकिया
बना दिया था। उस समय में उन शेष ने पश्चिम फन को तालवृत्त कर
दिया था। शेषरूपधारी ने शयन करते हुए जनार्दन प्रभु का व्यंजन
किया था। महान बलधारी उन्होंने ऐशानी फन से शंख, चक्र, नन्दक,
असि और दो इषुधीयों को और गरुड़ को धारण किया था।