कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextथी। फिर नग्न भूमि स्थित थी। वह दीर्घ तनु जल में था जिसको अनन्त
न धारण कर सके थे। उस समय हरि कर्म के रूप वाले हो गये थे
और अनन्त के काम को उन्होंने धारण किया था।
उस कच्छप ने अपने चरणों से नीचे ब्रह्माण्ड का आक्रमण करके
वायव्य दिशा में ग्रीवान्वित के पृष्ठ में अनन्तर को धारण किया था।
विशाल शरीरधारी भगवान् अनन्त देव ने कूर्म के पृष्ठ पर नौ वेष्टनों
(लपेटों) से अपने शरीर को देखकर सुख से ही पृथ्वी को धारण
किया। उसके अनन्तर अनन्त देव के फन पर चलती हुई पृथ्वी स्थित
हुई थी। वराह भगवान ने इस पृथ्वी को अचल बनाने का प्रयत्न किया
था और उसको अति सुदृढ़ अचलायमान कर दिया था। मेरु पर्वत को
अपने सुरों के द्वारा प्रहत करके पृथ्वीतल में गाड़ लिया था फिर उसका
भेदन करके वह पृथ्वी के अन्दर प्रवेश कर गये थे। वराह भगवान के
चरणों के प्रहारों से वह महान पर्वत सोलह सहस्त्र योजन तक रसातल
में प्रवेश कर गया था। हे द्विजोत्तमो! मेरु पर्वत का शिर उससे बत्तीस
हजार यौजन के विस्तार वाला हो गया था।
रुद्र और ब्रह्मा का नाम विभाजन
इसके उपरान्त ब्रह्माजी ने महान् ओज वाले वराह भगवान को
प्रणाम किया था और देवों के देव अर्धनारीश्वर को शरीर से समुत्पन्न
किया था। पहले ही उत्पन्न होने के साथ वह महान ध्वनि वाले वे रूदन
करने लगे थे। ब्रह्माजी ने उनसे कहा था कि तुम क्यों रो रहे हो। उन
महेश्वर ने उत्तर दिया था कि उनका नाम रखो। रुदन करने से वे रुद्र
नाम वाले हुए थे। उन ब्रह्माजी ने कहा- हे महाशय! आप रूदन मत
करो। इस प्रकार से कहे हुए वे रुद्र सात बार रोये थे अर्थात् सात बार
उन्होंने रुदन किया था। फिर ब्रह्माजी ने इसके उपरान्त सात दूसरे नाम
किये थे। शर्व, भव, भीम और चौथा नाम महादेव किया था। पाँचवाँ
नाम उग्र, छठवाँ नाम ईशान और परम पशुपति ये नाम किए थे।
ब्रह्माजी ने कहा-मेरे द्वारा जिस प्रकार से आपका विभाग किया गया