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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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छवि नीले मेघ के सदृश ही है। गरुड़ के ऊपर स्थल में चिह्न वाले,
परमशान्त और वनमाला के धारी, हरि का भजन करो। जो केयूर और
कुण्डलों को पहिने हुए हैं, जो किरीट और मुकुट से समुज्ज्वल हैं, जो
बिना आकार वाले केवल ज्ञान के द्वारा ही जानने योग्य हैं, जो आकार
के सहित देवधारी हैं, नित्य आनन्दस्वरूप, बिना अवलम्बन वाले और
सूर्य मण्डल के मध्य में संस्थित हैं ऐसे देवेश्वर विष्णु की इस मन्त्र के
द्वारा ही हे शुभानन वाली! आप यजन करो। वह मन्त्र ‘ॐ नमो
वासुदेवाय ॐ’ यह है। इसी मन्त्र के जाप के द्वारा निरन्तर मौनी होकर
तपश्चर्या का समारम्भ करो। उसमें कुछ नियम हैं उनका अब श्रवण करो।
नित्य स्नान मौन होकर करना चाहिए और मौन व्रत के साथ ही
पूजन करें। प्रथम तो छठवें दोनों कालों में पूर्ण और फलों का आहार
करें और तीसरे षष्ठ काल में उपवास परायण ही होना चाहिए। इस
प्रकार से तप की समाप्ति में षष्ठ काल की क्रिया होती है। वृक्षों के
छालों के वस्त्र धारण करें और उस समय पर भूमि में ही शयन करें।
इसी रीति से मौनी रहें और तपस्या नाम वाली व्रतचर्या फल के प्रदान
करने वाली होती है। इस तरह के तप का उपदेश करके इच्छापूर्वक
माधव भगवान का चिन्तन करो। वे प्रसन्न होकर आपके अभीष्ट को
शीघ्र ही प्रदान कर देंगे। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर
वशिष्ठ जी ने उस संध्या के लिए तप करने की क्रिया का उपदेश देकर
और उससे न्याय के अनुसार सम्भाषण करके मुनि वहीं पर अन्तर्धान
हो गये थे। उसने तपस्या के भाव का ज्ञान प्राप्त करके और परम
आनन्द प्राप्त करके उसने वृहल्लोहित के तीर पर स्थित होकर
तपश्चर्या करना आरम्भ कर दिया था। उसने वशिष्ठ मुनि ने जैसा
कहा था उस मन्त्र को तथा तप के साधन को करके उसी व्रत से
भक्तिभाव के द्वारा गोविन्द का पूजन किया था। परम एकान्त मन
वाली को चारों युगों (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलियुग) का समय व्यतीत
हो गया था।
उसके इस अद्भुत तप को देखकर कोई भी विस्मय को प्राप्त हुए