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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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൘൘ श्रीकालिका पुराण ൘൘ ११३
करता था। रोहिणी ही में परायण रहने वाले चन्द्र को देखकर वह सब
कन्याएं अनेक प्रकार के उपचारों के द्वारा चन्द्रमा की सेवा करने लगी
थीं। प्रतिदिन उनके द्वारा निषेवित होते हुए भी चन्द्र ने उनमें कुछ भी
भाव नहीं किया था तो उस समन में वे सब अमर्ष के वश में समागत
हो गयी थीं। इसके अनन्तर उत्तराफाल्गुनी नाम वाली, भरणी, कृत्तिका,
आर्द्रा, मघा, विशाखा, उत्तराभाद्रपद, ज्येष्ठा और उत्तराषाढ़ा ये नौ
बहुत ही अधिक कुपित हो गयी थीं। वे सब चन्द्र के समीप जाकर
चारों ओर से कहने लगी थीं।
निशानाथ को परिवृत करके फिर उन्होंने रोहिणी को देखा था जो
उस चन्द्रमा के वाम अंक में स्थित थी और उसके द्वारा अपने मण्डल
में रमण करने वाली थी। उन सबने उस वर्णिनी रोहिणी को उस प्रकार
की देखकर वे सब हवि से हुताशन की भी भाँति क्रोध से अत्यधिक
जल गयी थीं। इसके अनन्तर जिसके तीन पूर्व में है ऐसी पुनर्वसु, पुष्य
और आश्लेषा के सहिम मघा, भरणी और कृत्तिका ने चन्द्र की गोद
में स्थित महाभागा रोहिणी को हठ से पकड़कर ग्रहण कर लिया और
वे अतीव कुपित होती हुई रोहिणी के प्रति कठोर वचन कहने लगी
थीं। हे बुद्धि वाली! तेरे जीवित रहते हुए चन्द्र हम लोगों में बिल्कुल
भी अनुराग नहीं करता। जब भी किसी समय में यह चन्द्र सुरत में
उत्सुक होकर समुपस्थित होगा तभी बहुतों के क्षेम की वृद्धि के लिए
हम उस दुष्ट बुद्धि वाली का हनन कर देंगी। तुझको मारकर हमको
कुछ भी पाप नहीं होगा क्योंकि तू बहुत सी स्त्रियों के प्रजनन का हनन
करने वाली तथा बिना ही ऋतुकाल के पाप करने वाली है। जिस अर्थ
के विषय में पहले ब्रह्माजी ने अपने पुत्र के प्रति कहा था। नीति शास्त्र
के उपदेश के लिए वह निश्चय ही हमारा सुना हुआ है।
दोषयुक्त कर्म करने वाले किसी एक दुष्ट के जहाँ पर प्रवृत्त हो
जाने से यदि बहुतों का क्षेम होता है तो उसका वध पुण्य ही प्रदान
करने वाला हुआ करता है वहाँ किसी भी पाप के होने का तो प्रश्न
ही नहीं होता है। जो स्वर्ण की चोरी करने वाला है, जो मदिरा का पान