कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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[हेडर] ११२ श्रीकालिका पुराण
सार का महत्व भी सुनना चाहते हैं। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-हे
मुनिसत्तमो! अब आप लोग चन्द्रभागा की उत्पत्ति और चन्द्रभागा का
महात्म्य तथा नामकरण भी श्रवण कीजिए। हिमवान् पर्वत से संयुक्त
अर्थात् लगा हुआ, सौ योजन के विस्तार वाला और तीस योजन
आयाम अर्थात् चौड़ाई वाला एक कुन्द तथा इन्दु के समान धवल श्वेत
गिरि है।
उस पर्वत का पहले विधाता ने शुद्ध सुधा के निधि चन्द्रमा को
विभाग करके उसे पितामह देवान्न कल्पित किया था। कमल के आसन
वाले ब्रह्माजी ने उसी भाँति पितृगण के लिए तिथियों की क्षीणता व
वृद्धि के स्वरूप वाला जगत के हित सम्पादन के लिए कल्पित किया
था। हे द्विज श्रेष्ठो! उस जीमूत में चन्द्रमा विभक्त किया गया था।
इसीलिए देवों ने पहले समय में उस गिरि को नाम से चन्द्रभाग किया
था। ऋषियों ने कहा-यज्ञों के भागों में स्थित रहने पर तथा क्षीरसागर
से समुत्पन्न अमृत के रहने पर कमलासन (ब्रह्मा) ने किसलिए चन्द्र
का देवान्न किया था? उसी भाँति क्रम के रहते हुए किस कारण से
पितृगण के लिए उसे कल्पित किया गया था? हे ब्रह्मन्! यह हमको
बड़ा संशय हो रहा है। उसको आप हमको सूर्य की ही भाँति छेदन
करिए। द्विजोत्तम! आपके अतिरिक्त अन्य कोई भी इसका छेदन करने
वाला नहीं है।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-प्राचीन समय में प्रजापति दक्ष के
परमसुन्दरी सत्ताईस अश्विनी आदि अपनी पुत्रियों को सोम के लिए
प्रदान की थीं। उन समस्तों को ही विधि के साथ सोम ने अपने साथ
विवाह लिया था। उस समय में दक्ष के अनुमत में वह सोम सबको
अपने स्थान में ले गया। इसके अनन्तर चन्द्र उन समस्त कन्याओं में
राग से रोहिणी के ही साथ निवास करता था और रसोत्स व कला
आदि के द्वारा रमण किया करता था। वह सोम केवल रोहिणी का ही
सेवन किया करता था और रोहिणी के साथ ही आनन्द मनाया करता
था। रोहिणी कि बिना सोम कुछ भी शान्ति की प्राप्ति नहीं किया