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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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६०८९ श्रीकालिका पुराण ६०८९ १०५
देखकर एक क्षण पर्यन्त उसके देखने में उत्सुकता से रुक गए थे । उसी
सरोवर से एक शिप्रा नाम वाली नदी निकली हैं और वह दक्षिण सागर
को जा रही थी, जो जगत् के जनों को पावन कर रही थी, ऐसा उन्होंने
वहाँ पर देखा था । उस पूर्ण सरोवर के पास जाकर अनेक देशों से
समागत हुए परमाधिक सुन्दर दर्शन करते हुए बहुत से पक्षियों को
शम्भु ने अवलोकन किया था ।
वहाँ पर विराजित होकर उन्होंने गम्भीर वायु से एवं सम्पन्न तरंगों
में चक्रवाक के जोड़ों को नृत्य करते हुए देखा था । उन शम्भु भगवान
ने चञ्चुओं से तरंगों को पृथक-पृथक देखा था जिस तरह से जल से
पुनः उत्पन्न करते हुए पक्षियों को देखा हो । प्रत्येक तट पर श्रेणी में
आबद्ध हुए कादम्ब, सारस और हंसों के द्वारा अंगीकृत वह सागर जैसा
हो वैसा ही वह सरोवर था । जिसको शिव ने देखा था । बड़े-बड़े
मत्स्यों से युक्त अर्थात् बड़ी मछलियों के उछालों से क्षोभ को प्राप्त हुए
जल के शब्द से भय उत्पन्न होने वाले पक्षियों के द्वारा विहित शब्द
वहाँ पर हो रहा था । वहाँ पर उस मन के हरण करने वाले दृश्य का
अवलोकन किया था । विकास को प्राप्त हुए कमलों से और वहीं पर
मनोहर जलों से वह सरोवर परम शोभित हो रहा था । जिस तरह से
स्थूल और सूक्ष्म नक्षत्रों से स्वर्ग शोभयमान हुआ करता था । बड़े-बड़े
कमलों के मध्य में विरले ही नीलकमल उसमें दिखलाई दे रहे थे और
वह ऐसे ही शोभा से संयुक्त थे जैसे नक्षत्रों के मध्य में नीलमेघ का
खण्ड शोभित हुआ करता है ।
पद्मों के समूह के मध्य में संस्थित हम किन्हीं के द्वारा प्रस्तुत नहीं
हो रहे थे क्योंकि उनमें भी विकसित कमलों की भ्रान्ति होती थी।अर्थात्
उन हँसों को भी जो कमलों के बीच में स्थित थे खिले हुए कमल की
समझा जा रहा था । वे स्वर्गवासियों के द्वारा निश्चल ही दिखाई दे रहे
थे । दो प्रकार के रक्त और शुक्ल वर्ण के विकसित पद्मों को देखकर
ब्रह्माजी ने अपने आसन के कमल में काम में उत्फुल्लत्व और अरुणत्व
की अर्थात् विकास और लालिमा की निन्दा की थी । महादेवजी ने उस