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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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൵ श्रीकालिका पुराण ൵ १०३
औषधियों के प्रस्थ पर सखियों के साथ गौतम की आत्मजा विजया का
अवलोकन किया था। उसने भी उन समस्त सुरों को प्रणिपात करके
हर से कहा था। गिरीश से अपनी माता की भगिनी सती के विषय में
पूछती हुई ने क्रोध किया था। हे महादेव! आपकी वह सती कहाँ पर
है मेरे हृदय से दुःख दूर नहीं हट रहा है। मेरे ही आगे पहले समय में
उसने जिस समय में कोप से प्राणों को त्यागती है उसी समय में
शोकरूपी शल्य से विद्ध होकर सुख को प्राप्त नहीं करती हूँ। इतना
कहकर वस्त्र के छोर से मुख को ढककर अधिक रूदन करती हुई भूमि
पर गिर पड़ी थी और बहुत दुःख को प्राप्त हो गई थी।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- इसके पश्चात् उस समय में दाक्षायणी
का स्मरण करते हुए उसको भूमि पर गिरी हुई देखकर उस समय में
शोक से समुत्पन्न उद्वेगयुक्त रुज को शिव सहन न कर सके थे।
जिनका धीरज एकदम ही नष्ट हो गया था ऐसे भगवान् शम्भु वाष्पों
से व्याकुल लोचनों वाले हो गए थे अर्थात् उनके नेत्रों से अविरल अश्रु
प्रवाह चलने लग गया था। सभी देवों के देखते हुए वे भगवान् शिव
चिन्ता के ध्यान में तत्पर हो गये थे। इसके अनन्तर ब्रह्माजी ने शोक
से कथित विजया को ढाढ़स बँधाकर फिर भगवान् शंकर को
समाश्वासन देते हुए सान्त्वना से साथ यह वचन कहने लगे थे। ब्रह्माजी
ने कहा- भगवान्! आप पुराने योगी हैं। आपको ऐसा शोक करना
युक्त प्रतीत नहीं होता है। आपका ध्यान तो परधाम में ही था फिर यहाँ
पर सती में कैसे हो गया ? आप तो निरञ्जन हैं और आप बड़े-बड़े
यतियों के ध्यान में जानने के योग्य हैं। आप पर से भी पर हैं, आपका
स्वरूप निर्मल है तथा आप सर्वत्र गमन के स्वभाव एवं शक्ति से
समन्वित हैं। जो राग और लोभ आदि मल हैं उन मलों से आप विहीन
रहने वाले हैं। ऐसा ही आपका स्वरूप है उसे ही आप अपनी बुद्धि
से ग्रहण कीजिए।
प्राणी के अन्दर रहने वाले ज्ञान के विनाश करने वाले निम्नलिखित
चौदह दोष हुआ करते हैं। वे ये हैं-शोक, लोभ, क्रोध, मोह, हिंसा,