Skip to content
SarvaKosh
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 101 of 442

Read in context
Page 101

१०२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ

मार्कण्डेय मुनि ने कहा- ब्रह्माजी के द्वारा इस रीति से कहे हुए
शम्भु नीचे की ओर मुख वाले, ध्यान में परायण होकर अमित ओज
वाले ब्रह्माजी से बोले- हे ब्रह्मन्! जब तक मैं सती के द्वारा किए हुए
शोक से उत्तीर्ण होऊँ तब तक आप मेरे सखा हो व शोक का अपमोदन
करिये। हे ब्रह्माजी! उस अवसर पर मैं जहाँ-जहाँ पर भी गमन करूँ
वहाँ-वहाँ पर भी आप भी गमन करके मेरे इस दुस्सह शोक की हानि
करिए। तात्पर्य यही है कि मेरे ही सर्वदा साथ रहकर जहाँ पर भी मैं
जाऊँ वहीं पर मेरे शोक का विनाश करने की कृपा करें। लोकेश
ब्रह्माजी ने 'ऐसा ही होवे' यह वृषभवाहन से कहकर अर्थात् मैं आपके
साथ में सर्वत्र रहकर आपके शोक का विनाश करूँगा। फिर ब्रह्माजी
ने भगवान् शम्भु के ही साथ में कैलाश गिरि पर जाने का मन किया
था। ब्रह्माजी के साथ भगवान शम्भु को कैलाश पर्वत की ओर गमन
करने के लिए उत्सुक देखकर जो नन्दी और भृङ्गि आदिगण थे वे भी
यह देखकर वहाँ प्राप्त हो गये थे। फिर एक विशाल पर्वत के ही
समान वृषभ विधाता के सामने उपस्थित हो गया था जिस तरह से
सिताभ के सदृश गैरिक होवे। वासुकि आदि जो शर्व थे उन सबने
यथास्थान पर भगवान् शम्भु की बहुत शीघ्र वहाँ आकर शिव के शिर
और बहु आदि से उनको विभूषित कर दिया था। कथन का अभिप्राय
यही है कि वासुकी प्रभृति सब सर्प वहाँ आकर शिव के करादि अंगों
के आभूषण हो गये थे।
इसके अनन्तर ब्रह्मा, विष्णु और सती के पति महादेव समस्त देवों
के समूह के साथ हिमवान् पर्वत पर चले गए थे। इसके पश्चात् गिरि
अपने नगर से निकलकर उन औषधियों के प्रस्थों को अपने आत्माओं
के सहित सुरोत्तमों के सामने उपस्थित हुए थे। इसके अनन्तर उस
गिरिराज के द्वारा वे सभी सुरगण पूजे गये थे और सबका एक ही साथ
अभ्यर्चन किया गया था। वहाँ पर उस देवों के यजन करने में सभी
सचिव और पुरवासीगण भी सम्मिलित थे। वे सुरगण ही बहुत प्रसन्न
हुए थे। फिर वहीं पर उस गिरीन्द्र के नगर में भगवान् हर ने उस