Skip to content
SarvaKosh
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 100 of 442

Read in context
Page 100

ൠ८३ श्रीकालिका पुराण ൠ८३ १०१
अण्डजों से सकूल सागर का शीघ्र ही भेदन करके वाष्प उसके पूर्व
पुलिन पर चले गये थे और उन्होंने उस पुलिन का भी भेदन कर दिया
था। वेला का भेदन करके फिर पृथिवी का भेदन किया था और उन्होंने
एक नदी को बना दिया था। उन्होंने उस वैतरणी नाम वाली नदी को
बना दिया था जो पूर्व सागर की ओर गमन करने वाली थी। वह नदी
गर्म जल के होने के कारण से अत्यन्त भीषण थी जो किसी भी नौका,
विमान, द्रोणी और रथ के द्वारा भी पार करने के योग्य नहीं हो सकी
थी। पृथिवी महान् दुःख से साथ अब उसको धारण किए हुए थी। वह
सदा ही ऊर्ध्वगत अर्थात् ऊपर की ओर जाते हुए वाष्पों से नभश्चरों का
विक्षेपण करती हुई थी और उसके ऊपर से देवगण भी भय से आतुर
होकर गमन करते हैं।
यमराज के द्वार से परावर्तित होकर दोनों जल से विस्तार वाली
निम्न होती हुई वह सम्पूर्ण तीनों भुवनों को भय उत्पन्न करती हुई वहन
किया करती है। आपके शोक संतप्त निःश्वासों की वायुओं से समस्त
पर्वत और कानन व्याप्त हैं और समाकुल द्वीपीनाग आज तक भी
प्रतिशयन नहीं किया करते हैं। आपके संतप्त निःश्वासों से समुत्पन्न
वायु सम्पूर्ण जगत के सुख को पीड़ित करता हुआ वह बाधाहीन और
सनातन आज तक भी शमन को प्राप्त नहीं होता है। सती के शव
अर्थात् मृत शरीर को वह करनेवाले आपके पद-पद में यह पृथिवी
शीर्यमाण हो रही है और वह परम व्याकुल पृथिवी अपनी व्याकुलता
का मोचन नहीं कर रही है। इस समय न तो पाताल में और न स्वर्ग
में वह सत्व विद्यमान है जो आपके क्रोध से और शोक से हे
वृषभध्वज! व्याकुल न होवे। इसी कारण से आप शोक और अमर्ष
को परित्याग करके हम सब को शान्ति का प्रदान करो। अपनी आत्मा
के द्वारा ही अपनी आत्मा को जानिये अर्थात् स्वयं ही अपने आपके
स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कीजिए और आत्मा से ही आत्मा को धारण
करिए और वह सती दिव्यमान से सौ वर्षों के व्यतीत हो जाने पर त्रेता
युग के आदि में वही सती पुनः आपकी भार्या होगी।