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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 882

( १४ )

निरञ्जनबोध

निरञ्जन वचन

भया अधीन दोड़कर जोरी । तुम सतपुरुष सरन हम तोरी ॥
तुमसों बाल बुद्धि हम धारा । अब तुम करहु मोहि उद्धार ॥
बालक कोटि भांति गरियावत । मात पिता मन एक नहि आवत ॥
तुमहीं पुर्ष दीन मोहे राजू । औ पुनदीन्हसकलमोहिंसाजू ॥
तिहिं पर हमने गाउं बसावा । लीन्हे सुन्न ठिकान बनावा ॥
तहां हम साहब जाय रहाई । बिन आज्ञा कछु नाहिं कराई ॥
अबलग साहब मैं नहिं चीन्हा । सत्त पुर्ष तुम दर्शन दीन्हा ॥
दोड़कर जोरि चरणचितलावा । धन्य भाग हम दर्शन पावा ॥
अब मोहिं साहब भेद बताई । पाऊं चिह्न हंस पहुँचाई ॥

ज्ञानी वचन

सुन रे काल निरंजन राई । पुर्ष नाम है वीरा भाई ॥
जो हंसा चित भक्ति समोई । ताको खूट गहे मत कोई ॥

साखी

जो निज वीरा पाय है, आवै लोग हमार ।
ताको खूण्ट गहो मत, सुनो काल बटपार ॥

निरञ्जन वचन

चौपाई

सुनो गुसाईं विनती मोरी । वीरा पाय करै कछु औरी ॥
ज्ञान कथै अन्त चित वासा । आवागमनकी राखों आसा ॥

ज्ञानी वचन

सुनी निरंजन वचन हमारा । नहीं सत्त वह जीव तुम्हारा ॥

साखी

जा घरते जिव आइया, ताह सुध गई खोय ।
गोहराय कहों मैं जीवसों, जो शब्द पारखी होय ॥